अंतरिक्ष में $1 ट्रिलियन का AI डेटा सेंटर? मस्क का नया प्लान

एलन मस्क का नया विजन: अंतरिक्ष में विशालकाय डेटा सेंटर, धरती की AI computing के लिए।

एलन मस्क ने रविवार को ऑस्टिन में अपनी टीम के सामने एक प्रेजेंटेशन दी। विषय था — धरती की AI कंप्यूटिंग समस्या का हल, अंतरिक्ष में। आजकल हर बड़ी टेक कंपनी एआई मॉडल्स की ट्रेनिंग में जुटी है, जिसके लिए विशाल सर्वर फार्म और बेतहाशा बिजली चाहिए।

धरती पर जगह और पावर ग्रिड की अपनी सीमाएं हैं। इसी रुकावट को हटाने के लिए एलन मस्क अंतरिक्ष में लाखों सैटेलाइट्स का जाल बिछाना चाहते हैं। इस ‘ऑर्बिटल डेटा सेंटर’ प्रोजेक्ट के लिए टेक्सास के ऑस्टिन में ‘टेराफैब’ (Terafab) नाम की एक नई चिप फैक्ट्री लगाई जा रही है।

रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, स्पेसएक्स (SpaceX) और टेस्ला (Tesla) दोनों मिलकर इस महाप्रोजेक्ट को आगे बढ़ा रहे हैं। स्पेसएक्स हाल ही में मस्क की एआई कंपनी xAI के साथ जुड़ी है।

टेराफैब: 200 अरब चिप्स का उत्पादन

मस्क का दावा है कि यह नई ‘टेराफैब’ फैक्ट्री हर साल 200 अरब AI और मेमोरी चिप्स बनाएगी। (यह विशाल आंकड़ा मुख्य रूप से टेक वेबसाइट ‘फ्यूचरिज्म’ की रिपोर्ट पर आधारित है, क्योंकि रॉयटर्स ने इस विशिष्ट संख्या का जिक्र नहीं किया है)।

मस्क ने अपनी टीम को बताया कि टेराफैब तकनीकी रूप से दो अलग-अलग ‘फैब’ का समूह होगा। यहां हर फैब केवल एक ही डिजाइन की चिप बनाएगा।

पहली चिप टेस्ला की कारों और ‘ऑप्टिमस’ ह्यूमनॉइड रोबोट्स को पावर देगी। मस्क का कहना है कि 20 अरब डॉलर की लागत वाली इस फैक्ट्री का रखरखाव भी यही ऑप्टिमस रोबोट करेंगे (यह दावा मुख्य रूप से ‘फ्यूचरिज्म’ की रिपोर्ट पर आधारित है)। दूसरी चिप को खास तौर पर अंतरिक्ष के खतरनाक रेडिएशन और अत्यधिक तापमान को सहने के लिए डिजाइन किया जाएगा।

मस्क ने मौजूदा चिप सप्लायर कंपनियों का आभार जताया, लेकिन उन्होंने एक बड़ी चेतावनी भी दी। उनका मानना है कि भविष्य में उनकी कंपनियों की मांग पूरी दुनिया के कुल चिप उत्पादन से भी ज्यादा हो जाएगी। उन्होंने स्पष्ट कहा, “या तो हम टेराफैब बनाते हैं, या फिर हमारे पास चिप्स नहीं होंगे।”

‘स्टारशिप’ रॉकेट से भी विशाल होंगे सैटेलाइट

अंतरिक्ष में जाने वाले इन नए सैटेलाइट्स का आकार हैरान करने वाला है। ‘पीसीमैग’ (PCMag) और ‘फ्यूचरिज्म’ की रिपोर्ट बताती है कि इस AI सैटेलाइट का ‘मिनी’ वर्जन भी 408 फीट लंबे स्टारशिप रॉकेट से बड़ा होगा।

यह 358 फीट लंबे इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) को भी आसानी से पीछे छोड़ देगा। इनका आकार इतना बड़ा इसलिए होगा क्योंकि इन्हें पावर देने के लिए विशाल सोलर पैनल्स की जरूरत पड़ेगी।

अंतरिक्ष में कंप्यूटर को ठंडा रखने का विज्ञान

अंतरिक्ष में डेटा सेंटर चलाने की सबसे बड़ी तकनीकी चुनौती वहां पैदा होने वाली भीषण गर्मी को बाहर निकालना है। अंतरिक्ष का निर्वात (vacuum) एक इंसुलेटर की तरह काम करता है, जहां हवा नहीं होती।

इसलिए धरती की तरह पंखों से सर्वर को ठंडा नहीं किया जा सकता। इस चुनौती से निपटने के लिए एक खास लिक्विड कूलिंग सिस्टम का इस्तेमाल होगा।

प्रोसेसर के चारों ओर एक तरल पदार्थ घुमाया जाएगा। यह तरल गर्मी को सोखकर उसे बाहरी रेडिएटर पैनल्स तक ले जाएगा। वहां से यह गर्मी सीधे अंतरिक्ष के अंधेरे में रेडिएट (विकिरित) कर दी जाएगी।

ऊर्जा की खपत: मस्क और विशेषज्ञों के अलग दावे

इन तैरते हुए डेटा सेंटर्स की बिजली खपत को लेकर दो अलग-अलग आंकड़े सामने आए हैं। मस्क के प्रजेंटेशन के मुताबिक, एक सैटेलाइट के कंप्यूटिंग सिस्टम को चलाने के लिए करीब 100 किलोवाट ऊर्जा चाहिए।

वहीं, ‘आईईईई स्पेक्ट्रम’ (IEEE Spectrum) में एयरोस्पेस इंजीनियर एंड्रयू मैकेलिप ने एक स्वतंत्र और विस्तृत गणित तैयार किया है। उनके मॉडल के अनुसार, 1 गीगावाट (1-GW) क्षमता वाले नेटवर्क के लिए प्रति सैटेलाइट कम से कम 240 किलोवाट ऊर्जा की आवश्यकता हो सकती है।

मैकेलिप के मॉडल में 1,024 वर्ग मीटर के सोलर पैनल का जिक्र है, जो एक आम बास्केटबॉल कोर्ट से भी काफी बड़ा है। एक सैटेलाइट पर ग्राफिक प्रोसेसिंग यूनिट्स (GPU) के दो रैक हो सकते हैं। एक आम एनवीडिया (Nvidia) NVL72 जीपीयू रैक को ही 120 से 140 किलोवाट बिजली चाहिए होती है।

1 ट्रिलियन डॉलर का खर्च

मस्क ने अपनी टीम से दावा किया है कि अगले दो-तीन सालों में अंतरिक्ष में AI कंप्यूटिंग धरती के डेटा सेंटर्स से सस्ती हो जाएगी। लेकिन स्वतंत्र विशेषज्ञों के आंकड़े एक अलग ही जमीनी हकीकत दिखाते हैं।

पहले माना जाता था कि अंतरिक्ष में डेटा सेंटर बनाना धरती के मुकाबले 7 से 10 गुना ज्यादा महंगा होगा। मैकेलिप का कहना है कि अगर स्टारलिंक और टेस्ला की मौजूदा तकनीक का इस्तेमाल हो, तो यह खर्च धरती के मुकाबले 3 गुना ज्यादा रह सकता है।

धरती पर 1-GW सिस्टम बनाने और पांच साल तक चलाने का खर्च करीब 16 अरब डॉलर आता है। मैकेलिप के विश्लेषण के अनुसार, अंतरिक्ष में 1 गीगावाट क्षमता का डेटा सेंटर बनाने में करीब 50 अरब डॉलर का खर्च आएगा। इस क्षमता को हासिल करने के लिए लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में 4,300 सैटेलाइट्स का एक टाइट नेटवर्क बनाना होगा।

लेकिन मस्क का असली लक्ष्य अंतरिक्ष में 10 लाख सैटेलाइट्स स्थापित करना है। ‘आर्स टेक्निका’ (Ars Technica) का अनुमान है कि इतने बड़े बुनियादी ढांचे को लॉन्च करने और संचालित करने की कुल लागत 1 ट्रिलियन डॉलर को भी पार कर जाएगी।

खगोलविदों की बढ़ी चिंताएं

इतने बड़े पैमाने पर विशालकाय सैटेलाइट्स छोड़े जाने की योजना ने अंतरिक्ष वैज्ञानिकों की नींद उड़ा दी है। रेजिना यूनिवर्सिटी की एस्ट्रोनॉमर सामंथा लॉलर ने इन योजनाओं पर गहरी चिंता जताई है।

लॉलर ने कहा, “हमें लगता था कि हम जिस आकार का अनुमान लगा रहे हैं वह बेतुका है, लेकिन इस ग्राफिक से पता चलता है कि स्पेसएक्स जो करने की योजना बना रहा है, हमने उसे भी कम आंका था।”

लॉलर जैसे वैज्ञानिक पहले से ही स्टारलिंक सैटेलाइट्स की वजह से टेलिस्कोप ऑब्जर्वेशन में आ रही रुकावटों की शिकायत कर रहे थे। अब ये नए AI सैटेलाइट्स उनसे कई गुना ज्यादा बड़े होंगे, जो अंतरिक्ष के रहस्यों को देखने के रास्ते में एक पक्की दीवार बन सकते हैं।

वर्तमान में स्पेसएक्स के संभावित आईपीओ (IPO) का मूल्यांकन लगभग 1.75 ट्रिलियन डॉलर आंका जा रहा है। अंतरिक्ष में 10 लाख सैटेलाइट्स तैनात करने का यह बुनियादी खर्च ही कंपनी की अनुमानित कुल वैल्यू के लगभग बराबर बैठता है।


By Muhammad Sultan

मैं मुहम्मद सुल्तान हूँ, एक पैशनेट न्यूज़ राइटर। 'Global Update Today' के ज़रिए मेरी कोशिश रहती है कि दुनिया के हर कोने से साइंस, स्पेस और करंट अफेयर्स की वो ख़बरें आप तक लाऊँ, जो आपके लिए जानना ज़रूरी हैं। मेरी लिखी ख़बरों में आपको हमेशा डीप रिसर्च और आसान भाषा मिलेगी।

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