आल्प्स पर्वत पर पिघल रही है 6,000 साल पुरानी बर्फ, बाहर आ रहे हैं रोमन साम्राज्य के राज

आल्प्स पर्वत पर बर्फ के नमूने (आइस कोर) निकालते वैज्ञानिक
ऑस्ट्रिया के वीससीस्पिट्ज़ ग्लेशियर में वैज्ञानिकों ने 2019 से 2024 के बीच कई बार ड्रिलिंग की, क्योंकि यहाँ की बर्फ अब तेज़ी से पिघल रही है। Credit: Prof Andrea Fischer

सोचिए, आप 3,499 मीटर ऊंचे पहाड़ पर खड़े हैं, जहाँ आपके पैरों के नीचे 6,000 साल का इतिहास बर्फ में जमा है। पर अब वह इतिहास पानी बनकर बह रहा है। साल 2019 में जिस बर्फ की मोटाई 9.95 मीटर थी, वह 2025 आते-आते महज़ 5.5 मीटर रह गई। एक दशक से भी कम समय में हमने 4.5 मीटर बर्फ खो दी है।

ईस्टर्न आल्प्स में 3,499 मीटर की ऊंचाई पर खोज

मार्च 2026 में ‘फ्रंटियर्स इन अर्थ साइंस‘ जर्नल में एक नई रिसर्च छपी है। अज़ुरा स्पग्नेसी, डेविड वैक्स और उनकी टीम ने ऑस्ट्रिया के वीससीस्पिट्ज़ (Weißseespitze) ग्लेशियर का अध्ययन किया। वैज्ञानिकों ने 2019, 2021, 2023 और 2024 में चार बार यहाँ आकर बर्फ के नमूने लिए — यह बार-बार लौटना ही बताता है कि यह ग्लेशियर कितनी तेज़ी से सिकुड़ रहा है।

पहले वैज्ञानिक मानते थे कि ईस्टर्न आल्प्स के ग्लेशियर पुराने रिकॉर्ड सुरक्षित रखने के लिए सही नहीं हैं। उनका मानना था कि कम ऊंचाई के कारण यहाँ की बर्फ पिघल जाती है और डेटा खराब हो जाता है। लेकिन 2019 में निकाले गए आइस कोर ने इस धारणा को गलत साबित कर दिया।

इस ग्लेशियर की बर्फ सीधे नीचे की चट्टान से जमी हुई (frozen to bedrock) मिली, जिसमें पानी का रिसाव केवल कुछ दरारों तक ही सीमित था।

सतह से गायब हैं पिछले 371 साल

जब वैज्ञानिकों ने 2019 में यहाँ से बर्फ का नमूना (आइस कोर 2) निकाला, तो उन्हें एक अजीब बात पता चली। सतह की बर्फ में 1960 के दशक के परमाणु परीक्षणों का कोई निशान (ट्रिटियम एक्टिविटी) नहीं था। हीडलबर्ग यूनिवर्सिटी की आर्गन-39 (39Ar) डेटिंग तकनीक से पता चला कि 2019 में इस ग्लेशियर की सबसे ऊपरी सतह 371 साल पुरानी थी।

इसका मतलब है कि 1552 से 1708 ईस्वी के बाद की बर्फ हवा के कटाव और वाष्पीकरण के कारण पहले ही उड़ चुकी है। ग्लेशियर पर सर्दियों में चलने वाली तेज़ हवाएँ नई बर्फ को टिकने ही नहीं देतीं।

बर्फ में कैद रोमन और मध्यकालीन प्रदूषण

शोधकर्ताओं ने इस 9.95 मीटर लंबे आइस कोर के ऊपरी 8.5 मीटर हिस्से को 2022 में पिघलाकर उसका रासायनिक विश्लेषण किया। उन्होंने इसमें 18 अलग-अलग ‘ट्रेस एलिमेंट्स’ (जैसे लेड, जिंक, आर्सेनिक) और कार्बनिक अम्लों की जांच की।

बर्फ की सबसे निचली सतह का डेटा रोमन साम्राज्य (लगभग 128 ईस्वी) से लेकर प्रारंभिक आधुनिक काल (लगभग 1641 ईस्वी) तक की कहानी बताता है।

मध्य युग में लगी भयानक आग के सुबूत

बर्फ की 640 सेंटीमीटर की गहराई पर वैज्ञानिकों को लेवोग्लुकोसन (levoglucosan) का एक बहुत बड़ा स्तर मिला। यह रसायन लकड़ी या बायोमास जलने पर बनता है। कार्बन-14 और आर्गन-39 डेटिंग के अनुसार, यह हिस्सा 2019 से 891 साल पहले यानी 902 से 1280 ईस्वी के बीच का है।

इसी समय के आसपास (822 से 1092 ईस्वी) पास के श्वार्ज़बोडेन (Schwarzboden) दलदल में भी माइक्रो-चारकोल का भारी जमाव मिला था। यह वह दौर था जब यूरोप में तापमान बढ़ रहा था (Medieval Warm Period), और सूखे के कारण जंगलों में आग लगने की घटनाएँ तेज़ हो गई थीं। इसके साथ ही कृषि विस्तार और युद्ध जैसी इंसानी गतिविधियों ने भी आग को बढ़ावा दिया।

हवा में घुले जहर का हिसाब

पॉजिटिव मैट्रिक्स फैक्टराइजेशन (PMF) नाम की तकनीक से वैज्ञानिकों ने बर्फ में मौजूद प्रदूषण के चार मुख्य स्रोतों का पता लगाया। उन्होंने पाया कि उस समय 47 प्रतिशत रसायन समुद्री नमक और जैविक स्रोतों से आ रहे थे।

इसके बाद 37 प्रतिशत हिस्सा सेकेंडरी ऑर्गेनिक एरोसोल का था। बायोमास के जलने और धूल की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत थी। केवल 7 प्रतिशत प्रदूषण सीधे तौर पर इंसानी गतिविधियों का नतीजा था, जो औद्योगिक क्रांति से पहले के युग के हिसाब से बिल्कुल सही बैठता है।

चांदी और तांबे की खदानों का धुआं

1366 से 1029 ईस्वी (बर्फ की गहराई के आधार पर) और फिर 1652 से 1464 ईस्वी के बीच बर्फ में आर्सेनिक और लेड की मात्रा अचानक बढ़ गई थी। यह वह समय था जब यूरोप में चांदी और तांबे के खनन का काम तेज़ हुआ था।

शोधकर्ताओं ने जर्मनी के हर्ज़ पर्वत, इटली के बर्गमास्क आल्प्स और ट्रेंटो के पास मोंटे कैलिसियो जैसी जगहों का ज़िक्र किया है जहाँ से यह प्रदूषण उड़कर ग्लेशियर तक पहुंचा। चांदी, कैडमियम और बिस्मथ जैसे तत्वों का स्तर स्थानीय चट्टानों की प्राकृतिक मात्रा से 100 गुना अधिक पाया गया।

ज्वालामुखी फटने के निशान

बर्फ की परतें सिर्फ इंसानी कारनामों को ही नहीं, प्राकृतिक आपदाओं को भी सहेज कर रखती हैं। शोधकर्ताओं को 1235 ईस्वी और 1580 ईस्वी के आसपास सल्फेट और आर्सेनिक के स्तर में उछाल दिखा।

यह उत्तरी गोलार्ध में हुए बड़े ज्वालामुखीय विस्फोटों का सीधा असर था। 1580 ईस्वी के आसपास के रसायनों (Cr, Ni, Co, V) से पता चलता है कि उस समय ज्वालामुखी की राख के साथ-साथ सूखे के कारण उड़ने वाली धूल का भी वायुमंडल में भारी जमाव था।

खत्म हो रहा है 6,000 साल का आर्काइव

प्रकृति का यह 6,000 साल पुराना रिकॉर्ड अब हमेशा के लिए खत्म होने की कगार पर है। 2019 से लेकर 2025 तक इस ग्लेशियर ने अपनी 4.5 मीटर बर्फ खो दी है। अब यहाँ केवल 5.5 मीटर बर्फ बची है।

इस बर्फ के पिघलने का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि 19वीं और 20वीं सदी के औद्योगिक युग की परतें — जो यूरोप के कारखानों और कोयला खदानों का रिकॉर्ड रखती थीं — पहले ही हमेशा के लिए नष्ट हो चुकी हैं। इतिहास का वह हिस्सा जो हमें सबसे ज़्यादा समझना था, वही पहले मिट गया।

अनुमान है कि 2030 तक ओत्ज़टल (Ötztal) क्षेत्र के 30 प्रतिशत ग्लेशियर पूरी तरह से गायब हो जाएंगे। वीससीस्पिट्ज़ ग्लेशियर का पिघलना सिर्फ पानी का नुकसान नहीं है, यह सदियों पुराने इंसानी इतिहास और वायुमंडल के रहस्यों का हमेशा के लिए मिट जाना है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *