दिल्ली की बेमौसम बारिश और बिल गेट्स: वायरल दावों के पीछे का असली वैज्ञानिक सच

स्ट्रैटोस्फेरिक एरोसोल इंजेक्शन (SAI) के जरिए आसमान में रसायनों का छिड़काव करके पृथ्वी का तापमान कम करने की वैज्ञानिक अवधारणा पर शोध चल रहा है।

मार्च 2026 के मध्य में आपके फोन पर भी एक धुंधला स्क्रीनशॉट जरूर आया होगा। इसमें दावा किया गया था कि दिल्ली की अचानक हुई बारिश के पीछे बिल गेट्स का हाथ है। लोग सोच रहे थे कि क्या सच में किसी इंसान ने आसमान से सूरज की रोशनी को रोकने का कोई प्रयोग किया है।

दिल्ली की बेमौसम बारिश का असली कारण

मार्च 2026 में दिल्ली-एनसीआर का तापमान अचानक 29 डिग्री सेल्सियस से गिरकर लगभग 19 डिग्री सेल्सियस हो गया। 68 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवाएं चलीं और इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर कई उड़ानों का मार्ग बदलना पड़ा। भारत मौसम विज्ञान विभाग ने इसके बाद 30 से 50 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार वाली हवाओं का येलो अलर्ट जारी किया था।

मौसम विज्ञानियों ने स्पष्ट किया है कि इस बारिश का बिल गेट्स से कोई लेना-देना नहीं है। उत्तरी भारत में आए एक पश्चिमी विक्षोभ के कारण यह मौसम बदला था। हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में हुई बर्फबारी से ठंडी हवाएं मैदानी इलाकों की तरफ आई थीं।

बिल गेट्स और हार्वर्ड का वह प्रयोग जो कभी नहीं हुआ

इन वायरल दावों की जड़ें ‘स्ट्रैटोस्फेरिक एरोसोल इंजेक्शन’ (SAI) नाम के एक वैज्ञानिक विचार से जुड़ी हैं। बिल गेट्स ने आसमान के ऊपरी हिस्से में बदलाव करने और कार्बन डाइऑक्साइड को सोखने वाले अध्ययनों के लिए 4.5 मिलियन डॉलर का फंड दिया था। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी ने ‘स्कोपएक्स’ (SCoPEx) नाम का एक प्रोजेक्ट शुरू किया था।

वैज्ञानिक आर्कटिक के ऊपर 12 मील की ऊंचाई पर एक मौसम गुब्बारे से लगभग 4.4 पाउंड कैल्शियम कार्बोनेट पाउडर छोड़ना चाहते थे। यह प्रयोग कभी शुरू ही नहीं हो पाया। स्वीडन के स्थानीय आदिवासी समुदायों ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई थी।

इसके बाद हार्वर्ड ने 2024 की शुरुआत में इस प्रोजेक्ट को पूरी तरह से बंद कर दिया। गेट्स ने खुद स्पष्ट किया है कि वे दुनिया को जियोइंजीनियरिंग की तरफ नहीं धकेल रहे। उन्होंने इस तकनीक के ज्ञान को संभावित रूप से उपयोगी बताया, लेकिन इसे जमीन पर लागू करने के किसी भी प्रयास से खुद को अलग किया है।

सोलर जियोइंजीनियरिंग की शुरुआत कहां से हुई

इस तकनीक का विचार साल 1991 में फिलीपींस के माउंट पिनातुबो ज्वालामुखी फटने के बाद आया था। उस सदी के सबसे बड़े विस्फोटों में से एक इस ज्वालामुखी ने वायुमंडल में लाखों टन सल्फर डाइऑक्साइड छोड़ दिया था।

इसके प्रभाव से अगले एक साल तक पृथ्वी का औसत तापमान लगभग आधा डिग्री सेल्सियस गिर गया था। वैज्ञानिक अब गुब्बारों या विमानों का उपयोग करके उसी प्रभाव को कृत्रिम रूप से दोहराना चाहते हैं। वे वायुमंडल के ऊपरी हिस्से में परावर्तक कणों का छिड़काव करना चाहते हैं ताकि सूरज की रोशनी वापस अंतरिक्ष में लौट जाए।

भारतीय मॉनसून और खेती के लिए सबसे बड़ा खतरा

यह विचार भले ही सरल लगे लेकिन इसके नतीजे भारत के लिए गंभीर हो सकते हैं। भारत के लगभग 60 करोड़ लोग हर साल जून में आने वाले दक्षिण-पश्चिम मॉनसून पर सीधे तौर पर निर्भर हैं।

जलवायु मॉडल बताते हैं कि अगर उत्सर्जन अधिक रहा और बड़े पैमाने पर एरोसोल इंजेक्शन का इस्तेमाल हुआ तो उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में सालाना बारिश 5 से 7 प्रतिशत तक कम हो सकती है। कोलंबिया यूनिवर्सिटी के एक शोधकर्ता ने चेतावनी दी है कि इस तकनीक का असमान उपयोग भारतीय मॉनसून को पूरी तरह से रोक सकता है। सात अलग-अलग जलवायु मॉडलों के अध्ययन से पता चला है कि इस तकनीक से भारतीय भूभाग के बड़े हिस्से में सूखा पड़ सकता है।

ओजोन परत को नुकसान और टर्मिनेशन शॉक

अगर वैज्ञानिक हर साल एरोसोल का छिड़काव शुरू कर दें और फिर किसी युद्ध या आर्थिक संकट के कारण उसे अचानक रोक दें तो पृथ्वी का तापमान बहुत तेजी से बढ़ेगा। इसे टर्मिनेशन शॉक कहा जाता है।

इसके अलावा स्ट्रैटोस्फीयर में सल्फेट के कण ओजोन परत को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इससे पृथ्वी पर आने वाली पराबैंगनी विकिरण में वृद्धि होगी और त्वचा कैंसर का खतरा बढ़ जाएगा। सल्फर डाइऑक्साइड अंततः एसिड रेन के रूप में नीचे गिरता है। भारतीय आबादी में पहले से ही विटामिन डी की कमी है और लगातार धुंधला आसमान इस समस्या को और बढ़ा सकता है।

भारतीय विज्ञान और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की स्थिति

बेंगलुरु के भारतीय विज्ञान संस्थान में वैज्ञानिक गोविंदसामी बाला साल 2000 से सोलर जियोइंजीनियरिंग पर शोध कर रहे हैं। भारत के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग ने 2017 में दक्षिण एशियाई मॉनसून पर इस तकनीक के प्रभाव को समझने के लिए एक विशेष कार्यक्रम शुरू किया था।

भारतीय वैज्ञानिक इस पर सक्रिय हैं, लेकिन कूटनीतिक मोर्चे पर भारत की स्थिति अधूरी है। भारत ने जैव विविधता सम्मेलन (Convention on Biological Diversity) के जरिए औपचारिक रूप से इस तकनीक का विरोध किया है, लेकिन जिन अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह फैसला होना है, वहां भारत की आवाज अभी भी पर्याप्त नहीं सुनी जा रही।

साल 2024 की शुरुआत में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सभा में अमेरिका ने इन तकनीकों का अध्ययन करने के लिए एक विशेषज्ञ समूह बनाने के प्रस्ताव को रोक दिया था। यूरोपीय संघ के विज्ञान सलाहकारों ने इस तकनीक पर रोक लगाने की मांग की है।

निजी कंपनियां जो बिना नियम के आसमान बदल रही हैं

बिल गेट्स का प्रोजेक्ट भले ही बंद हो गया हो लेकिन कई छोटी निजी कंपनियां अब इस क्षेत्र में उतर आई हैं। अमेरिका का ‘मेक सनसेट्स’ नाम का एक स्टार्टअप व्यावसायिक रूप से मौसम गुब्बारों के जरिए स्ट्रैटोस्फीयर में सल्फर डाइऑक्साइड छोड़ रहा है। यह स्टार्टअप अपने ग्राहकों को कूलिंग क्रेडिट बेच रहा है और इसके लिए किसी अंतरराष्ट्रीय नियामक संस्था से अनुमति नहीं ली गई है।

साल 2025 के अंत में ‘स्टारडस्ट सॉल्यूशंस’ नाम की एक इजरायली कंपनी ने 60 मिलियन डॉलर की फंडिंग जुटाई। यह कंपनी सीधे सरकारों को जियोइंजीनियरिंग क्षमताएं बेचने की तैयारी कर रही है। कोलंबिया यूनिवर्सिटी के एक 2025 के अध्ययन ने संदेह जताया है कि बड़े पैमाने पर इस तकनीक का काम करना भौतिक रूप से बहुत मुश्किल है। इसके बावजूद निजी कंपनियां इस विचार को बेच रही हैं।

प्रदूषण करने वाले देशों की जवाबदेही का सवाल

मणिपाल एकेडमी ऑफ हायर एजुकेशन में पढ़ाने वाली धनश्री जयराम के अनुसार यह तकनीक दुनिया के सबसे बड़े प्रदूषण फैलाने वाले देशों को अपनी जिम्मेदारी से बचने का रास्ता दे सकती है। जिन देशों ने पिछले दो सौ सालों में कोयला और तेल जलाकर अपनी संपत्ति बनाई है वे अब एक ऐसी तकनीक पर पैसा लगा रहे हैं जिससे उन्हें उत्सर्जन में कटौती न करनी पड़े।

विकासशील देश जलवायु परिवर्तन के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील हैं। बिना किसी अंतरराष्ट्रीय संधि के निजी कंपनियों और अमीर देशों द्वारा आसमान से किए जा रहे ये प्रयोग भारत जैसे देशों के लिए एक वास्तविक चुनौती बन चुके हैं।


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