अंतरिक्ष की जमा देने वाली ठंड और मंगल पर हफ्तों तक चलने वाली धूल भरी आंधी की कल्पना कीजिए। इन भयानक हालात में हमारे सबसे भरोसेमंद सोलर पैनल भी पूरी तरह बेकार हो जाते हैं। चांद के जिन गहरे गड्ढों में जीवन की उम्मीद (बर्फ) छिपी है, वहां कभी सूरज की रोशनी नहीं पहुंचती।
अंतरिक्ष के इसी गहरे अंधेरे को मात देने के लिए नासा एक ऐतिहासिक दांव खेलने जा रहा है। दिसंबर 2028 में नासा अपना ‘स्पेस रिएक्टर-1’ (SR-1 Freedom) लॉन्च करेगा। यह अमेरिका का और दुनिया का पहला ‘न्यूक्लियर इलेक्ट्रिक प्रोपल्शन’ (NEP) इंटरप्लेनेटरी स्पेसक्राफ्ट होगा।
60 साल की नाकामी और 20 अरब डॉलर की राख
बीते छह दशकों में अमेरिका ने इस तकनीक को हकीकत बनाने के लिए 20 अरब डॉलर से ज्यादा फूंके हैं। 1965 में भेजा गया ‘SNAP-10A’ रिएक्टर एक मामूली खराबी के कारण महज 43 दिन में ही कबाड़ बन गया था।
तब से अंतरिक्ष में न्यूक्लियर रिएक्टर का सूखा पड़ा है। नासा के अधिकारी स्टीव सिनाकोर के मुताबिक, SR-1 इस पुराने फेलियर को हमेशा के लिए पीछे छोड़कर सौर मंडल की पहली “मालगाड़ी” साबित होगा।
48 घंटे में चालू होगा ‘ब्रेटन चक्र’
पुराने वॉयजर मिशन ‘RTG’ तकनीक (बैटरी सिस्टम) पर काम करते हैं, जो प्रोपल्शन (आगे बढ़ने) के काम नहीं आते। लेकिन SR-1 में 20 किलोवाट का असली विखंडन (Fission) रिएक्टर लगा होगा, जिसमें HALEU यूरेनियम का इस्तेमाल होगा।
लॉन्च के महज 48 घंटे के भीतर यह चालू हो जाएगा। यह एडवांस ‘ब्रेटन चक्र’ सिस्टम के जरिए भारी गर्मी को बिजली में बदलेगा, जिससे स्पेसक्राफ्ट के थ्रस्टर्स मंगल की ओर रफ्तार भरेंगे। अत्यधिक गर्मी को बाहर निकालने के लिए इसमें टाइटेनियम के खास रेडिएटर्स लगाए गए हैं।
हवा में खुलेंगे स्काईफॉल हेलीकॉप्टर
यह न्यूक्लियर स्पेसक्राफ्ट अपने साथ ‘स्काईफॉल’ (Skyfall) नाम का एक बेहद अहम पेलोड लेकर जा रहा है। इसमें ‘इनजेन्यूटी’ क्लास के तीन एडवांस हेलीकॉप्टर मौजूद होंगे।

ये हेलीकॉप्टर सीधे सतह पर नहीं उतरेंगे। मंगल के वायुमंडल में प्रवेश करते समय ये एक कैप्सूल से अलग होंगे और खुद अपनी सुरक्षित लैंडिंग (Skyfall maneuver) करेंगे। इनमें लगे ग्राउंड-पेनिट्रेटिंग रडार और कैमरे जमीन के नीचे छिपी बर्फ का नक्शा बनाएंगे। हालांकि, इन हेलीकॉप्टरों को छोड़ने के बाद SR-1 मंगल की कक्षा में रुकेगा या आगे बढ़ेगा, यह अभी तय नहीं हुआ है।
30 अरब डॉलर से अधिक का ‘मून बेस’ मास्टरप्लान
मंगल का यह मिशन असल में चांद पर इंसानी बस्ती बसाने की एक बड़ी रिहर्सल है। नासा के प्रशासक जेरेड इसाकमैन ने ‘गेटवे’ स्पेस स्टेशन का काम फिलहाल रोक दिया है ताकि चांद की सतह पर पूरा फोकस किया जा सके।
नासा ने चांद पर बस्ती बसाने के लिए 30 अरब डॉलर से अधिक के निवेश वाला तीन चरणों का मास्टरप्लान तैयार किया है। इसके अंतिम चरण (2033-2036) तक ‘लूनर रिएक्टर-1’ (LR-1) चांद पर पहुंच जाएगा, जो वहां की भयानक रातों में भी इंसानी बस्ती को जगमगाता रखेगा।
क्या विज्ञान पीछे छूट जाएगा?
तकनीक की यह न्यूक्लियर छलांग अंतरिक्ष में हमारे सफर के नियम बदलने वाली है। सौर ऊर्जा हमें सिर्फ हमारे ‘पड़ोस’ तक सीमित रखती है।
लेकिन पर्ड्यू यूनिवर्सिटी की ग्रह वैज्ञानिक ब्रायोनी होर्गन जैसी एक्सपर्ट्स को डर है कि छोटे हेलीकॉप्टरों के कारण कहीं बुनियादी विज्ञान इस नई न्यूक्लियर रेस की भेंट न चढ़ जाए। क्या यह नया पावर सिस्टम हमारे विज्ञान के सवालों के जवाब दे पाएगा या सिर्फ एक ट्रांसपोर्टेशन क्रांति बनकर रह जाएगा?

