रात में आसमान की तरफ देखते हुए हम अक्सर सोचते हैं कि क्या मंगल पर कभी कोई रहता था? जब 2014 में भारत का मंगलयान (Mangalyaan) लाल ग्रह की कक्षा में पहुंचा था, तो पूरी दुनिया की नज़रें इस बात पर थीं कि क्या वहां कभी पानी था।
सालों से हमें विज्ञान की किताबों में यही बताया गया कि मंगल का सारा पानी या तो अंतरिक्ष में उड़ गया या बर्फ की शक्ल में जम गया। लेकिन विज्ञान की दुनिया में अब एक ऐसा सच सामने आया है, जिसने इस पूरी कहानी को पलट दिया है।
लाल ग्रह का पानी शायद कभी पूरी तरह गायब हुआ ही नहीं था। वह बस हमारी नज़रों से छिपकर ज़मीन के काफी नीचे चला गया था। वैज्ञानिकों को अब ऐसे सुबूत मिले हैं जो बताते हैं कि मंगल के सीने में एक विशाल भूमिगत जल प्रणाली और तेज़ गति से बहने वाली नदियाँ मौजूद थीं।
क्रेटर्स के अंदर छिपा 4 किलोमीटर गहरा राज
जर्नल ऑफ जियोफिजिकल रिसर्च: प्लैनेट्स में हाल ही में एक रिपोर्ट छपी है। इस रिसर्च का नेतृत्व उट्रेक्ट यूनिवर्सिटी के डॉ. फ्रांसेस्को सलेसे ने किया।
उनकी टीम ने मंगल के उत्तरी गोलार्ध में ऐसे 24 गड्ढों (क्रेटर्स) को करीब से देखा, जो चारों तरफ से बंद थे। ये गड्ढे मंगल के औसत ‘समुद्र स्तर’ से करीब 4 किलोमीटर (2.5 मील) नीचे हैं।
इतनी गहराई पर वैज्ञानिकों को कुछ ऐसा दिखा जिसने उन्हें हैरान कर दिया। इन गड्ढों की दीवारों पर पानी से बने रास्ते, डेल्टा जैसी आकृतियां और भूजल से बनी घाटियां साफ़ दिखाई दे रही थीं।
सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि ये सभी आकृतियां 4 से 4.5 किलोमीटर की एक समान गहराई पर मिलीं। यह कोई इत्तेफाक नहीं था; यह इस बात का ठोस सुबूत था कि कभी पूरे मंगल ग्रह पर एक समान ‘वाटर टेबल’ (स्थिर जल स्तर) मौजूद था।
प्राचीन महासागर से जुड़ा था भूमिगत झीलों का जाल
डॉ. सलेसे के अनुसार, यह खोज अलग-अलग पानी के गड्ढों की नहीं, बल्कि एक ग्रह-व्यापी भूजल प्रणाली की पुष्टि करती है। इसी अध्ययन के सह-लेखक डॉ. जियान गेब्रियल ओरी ने इसे 3 से 4 अरब साल पुराने एक विशाल महासागर से जोड़ा है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि जब मंगल की सतह का पानी सूखने लगा, तो वह नीचे की ओर रिस गया। इस पानी ने ज़मीन के नीचे मौजूद झीलों के एक विशाल नेटवर्क को भर दिया।
जिन 24 क्रेटर्स की जाँच हुई, उनमें से पांच में मिट्टी, कार्बोनेट और सिलिकेट जैसे खनिज मिले हैं। पृथ्वी पर ये खनिज अक्सर जीवन पनपने वाले पानी के वातावरण में पाए जाते हैं।
यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) के मार्स एक्सप्रेस मिशन के डॉ. दिमित्री टिटोव का कहना है कि ये इलाके अतीत के जीवन के सुराग खोजने के लिए सबसे बेहतरीन जगहें हो सकती हैं।
जेज़ेरो क्रेटर: शांत झील नहीं, तेज़ नदी का रास्ता
मंगल के पानी की कहानी सिर्फ भूमिगत झीलों तक सीमित नहीं है। नासा के परसिवरेंस रोवर ने जेज़ेरो क्रेटर में सतह के नीचे एक प्राचीन नदी के संकेत खोजे हैं।
वैज्ञानिक पहले इसे एक साधारण प्रवाह मानते थे। लेकिन रोवर के आंकड़े बता रहे हैं कि वह पानी बेहद ताक़तवर था। यह नदी रफ्तार और आकार में पृथ्वी की मध्यम नदियों से कमतर नहीं थी।
यह अपने साथ रेत और छोटे पत्थर बहाकर ले जाने की ताकत रखती थी। साइंस एडवांस जर्नल की रिपोर्ट बताती है कि 3.7 से 4.2 अरब साल पहले यह नदी सिर्फ एक अचानक आई बाढ़ का नतीजा नहीं थी।
यह एक लंबे समय तक बहने वाली स्थिर नदी थी जिसने मंगल के कई इलाकों का रूप बदल दिया था। नदियां और झीलें इतने लंबे समय तक मौजूद रहीं कि उन्होंने घाटियों को तराशा और तलछट को मीलों दूर तक फैला दिया।
लेकिन परसिवरेंस ने यह सब ऊपर से नहीं, ज़मीन के भीतर झाँककर देखा।
रिमफैक्स रडार ने खोले 115 फीट नीचे के राज
इसके लिए रोवर में लगे ‘रिमफैक्स’ (Rimfax) उपकरण का इस्तेमाल किया गया। यह एक खास ग्राउंड-पेनिट्रेटिंग रडार है जो ज़मीन में रेडियो तरंगें भेजता है।
जब ये तरंगें रेत, चट्टान या बर्फ से टकराकर वापस लौटती हैं, तो उनके पैटर्न से ज़मीन के नीचे का नक्शा तैयार होता है। रोवर ने 78 यात्राओं में 115 फीट से अधिक की गहराई तक स्कैन किया।
रडार की तस्वीरें एक परिचित कहानी कह रही थीं। खड़ी और तिरछी परतें जो भूवैज्ञानिकों के लिए पानी के ज़ोरदार बहाव की पहचान हैं, साफ़ दिख रही थीं।
3,000 मील दूर चीनी रोवर को मिले प्राचीन समुद्र तट
पानी के सुबूत सिर्फ कक्षा से ली गई उपग्रह तस्वीरों या नासा के रोवर तक सीमित नहीं हैं। परसिवरेंस से लगभग 3,000 मील दूर, चीन के तियानवेन-1 मिशन के ज़ुरोंग रोवर ने भी ऐसे ही सुबूत खोजे हैं।
उटोपिया प्लैनिटिया (Utopia Planitia) नाम की जगह पर (जहाँ 1976 में नासा का वाइकिंग 2 उतरा था), ज़मीन की 30 से 115 फीट नीचे दबी परतों में चीनी रडार को पुराने समुद्र तटों की रूपरेखा मिली। यह रेखा एक मील तक खिंची हुई थी।
वैज्ञानिकों के अनुमान के मुताबिक़, वह महासागर इतना बड़ा था कि उसने मंगल की लगभग एक-तिहाई ज़मीन को अपने नीचे दबा रखा था। यूसी बर्कले के माइकल मंगा, जिन्होंने इस चीनी डेटा के विश्लेषण में मदद की थी, कहते हैं कि एक रोवर का मंगल पर जाकर ज़मीन के नीचे देखना ही अपने आप में हैरान करने वाला है।
11 अरब डॉलर का मिशन और मंगल से वापस आते नमूने
परसिवरेंस रोवर का मुख्य काम मंगल की चट्टानों और मिट्टी के उन नमूनों को इकट्ठा करना है जो पानी में बने थे। इन्हीं नमूनों में प्राचीन रासायनिक सुराग छिपे हो सकते हैं।
सितंबर में नासा ने बताया था कि एक नमूने में ऐसी जीवाश्म सामग्री मिली है जो शायद प्राचीन सूक्ष्मजीवों ने बनाई हो। हालांकि, नासा के वैज्ञानिक इसके पीछे किसी गैर-जैविक कारण होने की संभावना को भी पूरी तरह नकार नहीं रहे हैं।
नासा के विज्ञान विभाग की सहयोगी प्रशासक निकी फॉक्स के अनुसार, यह खोज हमें मंगल पर जीवन खोजने के सबसे करीब ले आई है। अब सबसे बड़ी चुनौती इन नमूनों को पृथ्वी पर लाना है।
‘मार्स सैंपल रिटर्न’ मिशन पर 11 अरब डॉलर से ज़्यादा का खर्च और दो दशक का समय लग सकता है। पृथ्वी की प्रयोगशालाओं में इन नमूनों की जांच होगी, जहाँ वैज्ञानिक कार्बनिक अणु, कोशिका संरचनाएं और डीएनए तलाशेंगे।
जवाब मिलेगा या नहीं, यह अभी कोई नहीं जानता। लेकिन मंगल पर जीवन की तलाश में यह सबसे करीबी क़दम ज़रूर है।

