पंजाब और हरियाणा से लेकर महाराष्ट्र तक, किसान अगली फसल की तैयारियों में जुटे हैं। लेकिन बीज बोने से पहले उनके माथे पर पसीना आ रहा है। खाद की उपलब्धता और बढ़ती कीमतों को लेकर किसानों में चिंता गहराने लगी है।
दुनिया के दो बड़े सप्लायर्स ने मोड़ा मुंह
पूरी दुनिया में खाद सप्लाई करने वाले दो सबसे बड़े देश, रूस और चीन ने अपने दरवाजे बंद कर दिए हैं। रूस ने 21 अप्रैल तक अमोनियम नाइट्रेट के निर्यात पर पूरी तरह से पाबंदी लगा दी है। वहीं, चीन ने नाइट्रोजन-पोटेशियम मिश्रित खादों और कुछ फॉस्फेट किस्मों पर नई पाबंदियां लगाई हैं। यूरिया पहले से ही कोटा सिस्टम में था।
खाड़ी का तनाव और 40% का भारी उछाल
यह पूरा संकट रातों-रात नहीं खड़ा हुआ है। मिडिल-ईस्ट में अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध ने ग्लोबल सप्लाई चेन की कमर तोड़ दी है।
होर्मुज के समुद्री रास्ते से जहाजों की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित हुई है, जहां से दुनिया की 24% से ज्यादा अमोनिया गुजरती है। इसका सीधा असर यह हुआ है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की कीमतें युद्ध शुरू होने के पहले के मुकाबले 40% तक बढ़ चुकी हैं।
रूस की मजबूरी और चीन का ‘फूड सिक्योरिटी’ प्लान
रूस दुनिया भर में अमोनियम नाइट्रेट का 40% व्यापार अकेले संभालता है। लेकिन यूक्रेन के ड्रोन हमलों से उसकी एक प्रमुख फैक्ट्री — डोरोबोगुश (Dorogobuzh) प्लांट — बंद पड़ी है, जो रूस के कुल अमोनियम नाइट्रेट उत्पादन का 11% बनाती है। दूसरी तरफ, चीन भी अपने किसानों को महंगाई से बचाने के लिए सप्लाई रोक रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि चीन अपनी ‘फूड सिक्योरिटी’ को लेकर बहुत सतर्क है, इसलिए यह निर्यात पाबंदी अगस्त तक खिंच सकती है।
भारत की निर्भरता का उलझा गणित
भारत अपनी जरूरत का 40% यूरिया और डीएपी सीधे मिडिल-ईस्ट से खरीदता है। पिछले साल भारत ने अपनी कुल जरूरत का करीब 16% खाद अकेले चीन से आयात किया था। दूसरी ओर, रूस के बैन से ब्राजील जैसे देशों में भी भारी खलबली मची हुई है, क्योंकि रूस उनकी 25.9% जरूरत पूरी करता है।
कूटनीतिक रास्ते और भारत की मांग
इस संकट से निपटने के लिए भारत ने चीन से यूरिया के लिए विशेष निर्यात कोटा जारी करने की आधिकारिक मांग की है। सरकार की कोशिश है कि घरेलू बाजार में किसानों को बुवाई के वक्त किसी भी तरह की कमी का सामना न करना पड़े।
क्या हम एक नए खाद्य संकट की ओर हैं?
जब दुनिया के बड़े देश अपने फायदे के लिए इस तरह सप्लाई चेन को रोक देते हैं, तो इसका सीधा असर आम आदमी की थाली पर पड़ता है। खेती की लागत बढ़ने से अनाज और सब्जियों की कीमतें आसमान छूने लगती हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या हमें अपनी खेती को विदेशी खादों की इस भारी निर्भरता से मुक्त करने के लिए कोई ठोस और स्थायी कदम नहीं उठाना चाहिए?

