मार्च का महीना शुरू ही हुआ है और गर्मी ने अपने तेवर दिखाने शुरू कर दिए हैं। लेकिन अगर आपको लग रहा है कि यह सिर्फ मौसम का बदलना है, तो संयुक्त राष्ट्र (UN) की नई चेतावनी आपकी नींद उड़ा सकती है।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने 3 मार्च 2026 को अपना नया मौसमी डेटा जारी किया है। इसके मुताबिक, ठंडक लाने वाला ‘ला नीना’ (La Niña) अब धीरे-धीरे खत्म हो रहा है। इसके साथ ही, इस साल के मध्य तक दुनिया का तापमान बढ़ाने वाले ‘अल नीनो’ (El Niño) के लौटने का खतरा 40 प्रतिशत तक बढ़ गया है।
2024 की रिकॉर्ड गर्मी और 2025 का ‘ला नीना’
याद कीजिए 2024 की वह चिलचिलाती गर्मी, जिसने भारत समेत पूरी दुनिया को झुलसा दिया था। वह इतिहास के पांच सबसे ताकतवर ‘अल नीनो’ में से एक का सीधा असर था।
साल 2025 में ला नीना ने थोड़ी राहत ज़रूर दी, लेकिन फिर भी वह इतिहास के तीन सबसे गर्म सालों में शुमार हो गया। 2025 में धरती का औसत तापमान “पूर्व-औद्योगिक” (Pre-industrial) समय की तुलना में 1.43 डिग्री सेल्सियस ज़्यादा दर्ज किया गया। 1850 से लेकर अब तक के रिकॉर्ड देखें, तो पिछले 11 साल हमारी पृथ्वी के 11 सबसे गर्म साल रहे हैं।
समंदर के अंदर उबलता पानी और ‘ऊर्जा असंतुलन’
अल नीनो की वापसी से भी ज़्यादा डरावनी बात WMO की वार्षिक जलवायु रिपोर्ट में सामने आई है। हमारी पृथ्वी इस वक्त एक भयानक “ऊर्जा असंतुलन” (Energy Imbalance) से गुज़र रही है। इसका सीधा मतलब यह है कि धरती जितनी गर्मी बाहर अंतरिक्ष में निकाल रही है, उससे कहीं ज़्यादा वह अपने अंदर सोख रही है।
यह फंसी हुई अतिरिक्त गर्मी का 90 प्रतिशत से ज़्यादा हिस्सा हमारे समंदरों में जा रहा है। पिछले साल वैश्विक महासागरों के ऊपरी 2 किलोमीटर (1.2 मील) हिस्से ने गर्मी सोखने का एक नया रिकॉर्ड बनाया। आज हमारे महासागर 20वीं सदी के अंत की तुलना में दोगुनी तेज़ी से गर्म हो रहे हैं।
20 लाख साल का रिकॉर्ड और पिघलते ग्लेशियर
इस पूरी तबाही की असली जड़ वह धुआं है जो इंसान की फैक्ट्रियों और गाड़ियों से निकल रहा है। आज वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) का स्तर पिछले 20 लाख (Two million) सालों में सबसे ज़्यादा है।
इसका असर ज़मीन और बर्फ पर साफ़ दिख रहा है। 2024/25 में दुनिया के ग्लेशियरों ने अपनी बर्बादी के पांच सबसे बुरे साल देखे। दोनों ध्रुवों (Poles) पर समुद्री बर्फ 2025 के ज़्यादातर समय में अपने सबसे निचले स्तर पर रही।
WMO की महासचिव सेलेस्टे सौलो ने साफ़ कहा है, “मानवीय गतिविधियां प्राकृतिक संतुलन को तेज़ी से बिगाड़ रही हैं और हमें सैकड़ों-हज़ारों सालों तक इन परिणामों के साथ जीना होगा।”
आज का असर: अमेरिका में झुलसाने वाली ‘हीटवेव’
यह सब सिर्फ भविष्य की बातें नहीं हैं, इसका असर अभी से शुरू हो चुका है। अमेरिका का दक्षिण-पश्चिम हिस्सा इस वक्त रिकॉर्ड तोड़ने वाली शुरुआती ‘हीटवेव’ की चपेट में है।
वहाँ कई जगहों पर तापमान 40 डिग्री सेल्सियस को पार कर गया है, जो इस मौसम के औसत तापमान से 10 से 15 डिग्री ज़्यादा है। ‘वर्ल्ड वेदर एट्रिब्यूशन’ के वैज्ञानिकों ने अपनी जांच में पाया कि अगर इंसानों ने जलवायु परिवर्तन न किया होता, तो इतनी भयानक गर्मी का आना “लगभग असंभव” था।
2026-27 के लिए क्या है WMO का अलर्ट?
WMO के पूर्वानुमानों के अनुसार, मार्च से मई 2026 के बीच प्रशांत महासागर में हालात ‘तटस्थ’ (Neutral – न अल नीनो, न ला नीना) रहने की 60% संभावना है। अप्रैल से जून तक यह संभावना 70% हो जाएगी। लेकिन असली खेल मई-जुलाई के बीच शुरू होगा, जब अल नीनो के लौटने का खतरा बढ़कर 40% तक पहुंच जाएगा।
हालाँकि, वसंत ऋतु के दौरान ‘प्रेडिक्टेबिलिटी बैरियर’ के कारण बहुत लंबी अवधि की सटीक भविष्यवाणी करना मुश्किल होता है। लेकिन WMO के डॉ. जॉन कैनेडी ने चेतावनी दी है कि अगर अल नीनो वापस आता है, तो 2027 में वैश्विक तापमान गर्मी के नए रिकॉर्ड तोड़ सकता है।
अगला कदम क्या है?
WMO महासचिव सेलेस्टे सौलो ने बताया कि मौसम के ये पूर्वानुमान सिर्फ डराने के लिए नहीं होते। ये कृषि, स्वास्थ्य, ऊर्जा और जल प्रबंधन जैसे क्षेत्रों को करोड़ों डॉलर के भारी नुकसान से बचाने में मदद करते हैं और जीवन बचाते हैं।
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने एक कड़े संदेश में साफ कर दिया है कि पृथ्वी अपनी सीमाएं पार कर चुकी है। अब दुनिया के पास जीवाश्म ईंधन (कोयला, तेल) पर अपनी निर्भरता खत्म करके तेज़ी से नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) की तरफ जाने के अलावा कोई ठोस विकल्प नहीं बचा है।

