आपके शहर के बाहरी इलाके में एक विशाल इमारत बनती है। इस इमारत में कोई चिमनी नहीं है और न ही इससे कोई धुआं निकलता है। लेकिन इसके शुरू होने के कुछ ही महीनों बाद, आपको अपने घर के आसपास की हवा में एक अजीब सी तपिश महसूस होने लगती है। यह असल में उन कंप्यूटर सर्वर्स की भारी गर्मी है, जो दुनिया भर में हमारी एआई (AI) आधारित जरूरतों को पूरा करने के लिए दिन-रात तप रहे हैं। जैसे-जैसे डिजिटल सेवाओं की मांग बढ़ रही है, डेटा सेंटर्स की संख्या और उनकी ऊर्जा खपत भी तेजी से ऊपर जा रही है।
2.07 डिग्री की वो छलांग जो मौसम बदल रही है
कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी और नानयांग टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने डेटा सेंटर्स के इसी असर पर एक बड़ा खुलासा किया है । उनके ‘मल्टीमॉडल मल्टीस्केल एनालिसिस’ के मुताबिक, जब कोई एआई डेटा सेंटर पूरी तरह काम करना शुरू करता है, तो उसके आसपास की जमीन का तापमान औसतन 2.07°C तक बढ़ जाता है। वैज्ञानिकों की टीम ने इस नई और गंभीर पर्यावरणीय चुनौती को ‘डेटा हीट आइलैंड इफ़ेक्ट’ का नाम दिया है।
इस शोध के लिए नासा (NASA) के सैटेलाइट द्वारा जुटाए गए 2004 से 2024 तक के तापमान डेटा का बारीकी से विश्लेषण किया गया है। नतीजों को पूरी तरह सटीक रखने के लिए टीम ने दुनिया भर के 8,472 ऐसे डेटा सेंटर्स की जांच की, जो घनी आबादी वाले और औद्योगिक शहरों से बिल्कुल बाहर बने हुए हैं। इस कदम से शहरों के अपने प्रदूषण और कंक्रीट की गर्मी का असर रिसर्च के आंकड़ों से अलग हो गया।
शहरी गर्मी के बराबर खड़ा एक नया संकट
हम सालों से ‘अर्बन हीट आइलैंड’ के बारे में सुनते आ रहे हैं, जहां शहरों का कंक्रीट और डामर तापमान को 4 से 6°C तक बढ़ा देता है । डेटा सेंटर्स से पैदा होने वाली 2.07°C की यह नई गर्मी भले ही उससे थोड़ी कम हो, लेकिन यह सीधे तौर पर उसी स्तर की एक बिल्कुल नई और स्वतंत्र चुनौती खड़ी कर रही है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि सर्वर की यह तपिश सिर्फ उस डेटा सेंटर की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहती । यह गर्मी अपने केंद्र से 10 किलोमीटर दूर तक के इलाके को अपनी चपेट में ले रही है। डेटा सेंटर से करीब साढ़े चार किलोमीटर के दायरे में तो तापमान में 1°C की पक्की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
अगर हम इस 10 किलोमीटर के दायरे में रहने वाले लोगों की गिनती करें, तो यह आंकड़ा किसी भी नीति-निर्माता को रुककर सोचने पर मजबूर कर देता है। पूरी दुनिया में करीब 34 करोड़ लोग इस ‘डेटा हीट आइलैंड इफ़ेक्ट’ के असर वाले क्षेत्रों में रहने को मजबूर हैं। यह भविष्य में उनके स्वास्थ्य और स्थानीय ऊर्जा प्रणालियों को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।
दुनिया के तीन इलाकों की जमीनी हकीकत
यह समस्या किसी एक देश तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्लोबल स्तर पर अपना असर दिखा रही है। मेक्सिको के बाजीओ (Bajio) इलाके में पिछले 20 सालों में डेटा सेंटर्स की संख्या तेजी से बढ़ी है। इसके चलते इस इलाके में तापमान में लगभग 2°C की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जो इसके पड़ोसी इलाकों में बिल्कुल नहीं देखी गई।
स्पेन का आरागोन (Aragon) प्रांत अब यूरोप का बड़ा एआई हब बन चुका है। यहां भी तापमान में 2°C का ही स्पष्ट उछाल देखा गया है, जो पूरे यूरोप के औसत तापमान वृद्धि से काफी अलग और असामान्य है।
इसी तरह ब्राज़ील के सेआरा (Ceará) और पियाउई (Piauí) राज्यों में भी हालात तेजी से बदल रहे हैं। टेरेसिना शहर के आसपास एआई सर्विस हब विकसित होने से तापमान पहले ही 2.8°C तक बढ़ चुका है। एक हालिया जलवायु अध्ययन के पूर्वानुमान के अनुसार, अगले पांच सालों में यह तापमान 3.5°C के पार जा सकता है।
हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर में खोजे जा रहे समाधान
इतनी बड़ी समस्या सामने आने के बाद इंजीनियर अब इस बेतहाशा गर्मी को मात देने के नए तरीके खोज रहे हैं। सॉफ्टवेयर के स्तर पर ‘आइसोजियोमेट्रिकल नेटवर्क’ जैसी नई तकनीकों को आजमाया जा रहा है, ताकि एआई मॉडल्स कम ऊर्जा खर्च करके भी सटीक नतीजे दे सकें। डीप लर्निंग मॉडल्स को हल्का करने के लिए प्रूनिंग और कम्प्रेशन के विकल्प भी तलाशे जा रहे हैं।
हार्डवेयर के मोर्चे पर ‘एडियाबेटिक सर्किटरी’ का प्रयोग आजमाया जा रहा है, जो कंप्यूटर चिप्स के अंदर ही ऊर्जा को रीसायकल कर लेता है। इसके अलावा इमारतों को बिना बिजली के ठंडा रखने के लिए छतों पर ‘पैसिव रेडिएटिव कूलिंग’ कोटिंग की जा रही है। इस तकनीक से कूलिंग का कुल खर्च 10% से 40% तक कम हो सकता है।
पर्यावरण और तकनीक का सीधा टकराव
वैज्ञानिकों ने ‘मैट्रियोश्का मॉडल’ नाम का एक नया सिद्धांत पेश किया है । यह थ्योरी मानती है कि एआई सिस्टम्स को सिर्फ डेटा ही प्रोसेस नहीं करना चाहिए, बल्कि अपनी ऊर्जा खपत और भौतिक पर्यावरण के नियमों का भी पूरी तरह से ध्यान रखना चाहिए।
तकनीक ने हमारे जीवन को अभूतपूर्व गति दी है, लेकिन इसके पीछे खामोशी से तपते सर्वर एक बड़ी पर्यावरणीय कीमत मांग रहे हैं। क्या हम अपनी डिजिटल सुविधाओं की कीमत अपनी ही आबोहवा को गर्म करके चुकाते रहेंगे, या फिर हम समय रहते कोई ऐसा स्थायी समाधान निकाल लेंगे जो इंसानी तरक्की और प्रकृति दोनों को सुरक्षित रख सके?
- डिजिटल रेफरेंस (arXiv Preprint): arXiv:2603.20897v1 [cs.CY] 21 Mar 2026 ।

