समुद्र हमारे अनुमान से एक फुट ज़्यादा ऊंचा है

पिछले तीन दशकों में दुनियाभर के वैज्ञानिकों ने समुद्री बाढ़ के जितने भी नक्शे बनाए, जितनी भी चेतावनियाँ दीं — उनमें से 90 प्रतिशत एक बुनियादी ग़लती पर टिकी थीं।

चार मार्च 2026 को विज्ञान की सबसे भरोसेमंद पत्रिका Nature में छपी एक नई स्टडी ने यह साबित किया कि समुद्र का असली जलस्तर उन मॉडलों की तुलना में औसतन 30 सेंटीमीटर — यानी करीब एक पूरा फुट — ऊंचा है।

वो ‘शून्य’ जिसने सब कुछ उलट दिया

इटली की यूनिवर्सिटी ऑफ पादुआ की Katharina Seeger और नीदरलैंड्स की Wageningen University के Philip Minderhoud ने 2009 से 2025 के बीच प्रकाशित 385 तटीय जोखिम अध्ययनों को खंगाला।

उन्होंने पाया कि अधिकांश मॉडलों ने समुद्र की ऊंचाई नापने के लिए एक काल्पनिक “शून्य मीटर” को आधार माना। लेकिन असली समुद्र पर समुद्री धाराएं, हवा, ज्वार-भाटा, पानी का तापमान और एल नीनो जैसी मौसमी हलचलें असर डालती हैं — जिन्हें इन मॉडलों ने नज़रअंदाज़ किया।

अध्ययन के अहम आंकड़े : एक नज़र में

  • 385 तटीय अध्ययनों की समीक्षा की गई
  • ~90% अध्ययनों ने जलस्तर को कम आंका
  • औसत गलती: ~30 सेमी (करीब 1 फुट)
  • Indo-Pacific में कुछ जगहों पर गलती: ~1 मीटर तक
  • अतिरिक्त खतरे में जनसंख्या: 7.7 करोड़ से 13.2 करोड़
  • 2100 तक अतिरिक्त बाढ़-भूमि: 37% ज़्यादा

मुंबई, चेन्नई, कोलकाता : क्या ये शहर तैयार हैं?

स्टडी में सबसे बड़ी माप-त्रुटियाँ Indo-Pacific क्षेत्र में मिली हैं — और भारत इसी क्षेत्र में आता है।

तीन शहर सीधे जोखिम में हैं:

  • मुंबई: कोलाबा, धारावी और कुर्ला जैसे निचले इलाके समुद्र तल के बेहद करीब हैं। मानसून में हर साल बाढ़ आती है और तटीय दीवारें पुराने — अब संदिग्ध — जलस्तर के आधार पर बनी हैं।
  • चेन्नई: मरीना बीच के किनारे घनी आबादी रहती है। 2015 की बाढ़ में शहर घुटनों तक डूब गया था — और वो पुराने अनुमानों से भी हुआ था।
  • कोलकाता: गंगा डेल्टा पर बसा यह शहर पहले से भूमि धंसाव झेल रहा है। ऊपर से समुद्र का बढ़ता जलस्तर — दोहरा बोझ।

सभी बड़े अंग्रेज़ी अखबारों ने इसे एक वैश्विक चेतावनी की तरह रिपोर्ट किया। लेकिन असली सवाल यह है कि भारत के तटीय बाढ़ नक्शे, समुद्री सुरक्षा दीवारें और आपदा प्रबंधन योजनाएं — क्या ये सब उसी ग़लत baseline पर बनी हैं?

अगर हाँ, तो इन ढांचों की वास्तविक क्षमता पर गंभीर सवाल उठते हैं।

2100 तक आगे क्या होगा?

वैज्ञानिक पहले से जानते हैं कि ग्लेशियरों के पिघलने और गर्म होते महासागरों के फैलाव से जलस्तर बढ़ रहा है। अगर 2100 तक यह एक मीटर बढ़ता है — जो IPCC का मध्यम अनुमान है — तो सही baseline के साथ बाढ़ में डूबने वाली ज़मीन 37 प्रतिशत ज़्यादा होगी।

Nature की यह स्टडी कहती है कि समस्या समुद्र में नहीं, हमारे मापने के तरीके में थी।

तो सवाल यह है — अगर नापने का तरीका ही ग़लत था, तो अब तक जो सुरक्षा की तैयारी हुई है, वो किस काम की?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *