पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के शार्क बे इलाके में दोपहर का वक्त था और सब कुछ सामान्य लग रहा था। अचानक आसमान का रंग बदलने लगा और कुछ ही मिनटों में दिन का उजाला पूरी तरह गायब हो गया। पूरे आसमान पर खून जैसा एक गहरा क्रिमसन रंग छा गया।
स्थानीय लोगों को एक पल के लिए लगा जैसे वे किसी साइंस फिक्शन फिल्म के सेट पर आ गए हों। विजिबिलिटी इतनी कम हो गई कि चंद कदमों की दूरी पर देखना भी नामुमकिन हो गया।
यह कोई कैमरा ट्रिक या हॉलीवुड का वीएफएक्स (VFX) नहीं था। यह सब 27 मार्च 2026 को पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के तट से टकराए एक बेहद ताकतवर तूफान ‘साइक्लोन नरेल’ का असर था।
एक दुर्लभ ‘ट्रिपल-स्ट्राइक’ तूफान की तबाही
मौसम विज्ञानी इसे ‘ट्रिपल-स्ट्राइक’ तूफान कह रहे हैं, क्योंकि ऑस्ट्रेलिया के इतिहास में केवल तीसरी बार किसी तूफान ने तीन अलग तटों पर दस्तक दी है। 20 मार्च को यह सबसे पहले क्वींसलैंड के केप यॉर्क पेनिनसुला से टकराया था।
इसके बाद यह नॉर्दर्न टेरिटरी से गुजरा और फिर हिंद महासागर के ऊपर जाकर इसने दोबारा ताकत बटोरी। 27 मार्च को जब यह पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के तट पर पहुंचा, तब यह एक ‘कैटेगरी 4’ का भयंकर तूफान बन चुका था।
इस दौरान लगातार हवा की रफ्तार 125 किलोमीटर प्रति घंटे थी, जबकि हवा के झोंके (gusts) 200 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार तक पहुंच गए थे। इस खौफनाक हवा ने एक्समाउथ और कोरल बे जैसे इलाकों में कई इमारतों की छतें उड़ा दीं।
हालांकि, 29 मार्च तक कमजोर होकर यह ‘कैटेगरी 3’ में आ गया था और धीरे-धीरे एक सबट्रॉपिकल लो (subtropical low) में बदल गया।
आसमान का रंग नीला क्यों होता है?
आसमान के लाल होने की वजह physics में है। पहले यह समझो कि साफ दिन में आसमान नीला क्यों दिखता है।
विज्ञान की भाषा में इसे ‘रेले स्कैटरिंग’ (Rayleigh scattering) कहते हैं। जब सूरज की रोशनी हमारे वायुमंडल में मौजूद नाइट्रोजन और ऑक्सीजन के छोटे अणुओं से टकराती है, तो रोशनी बिखर जाती है।
चूंकि नीले रंग की वेवलेंथ (तरंग दैर्ध्य) छोटी होती है, इसलिए यह वायुमंडल में सबसे ज्यादा फैलती है। यही वजह है कि साफ दिन में हमें आसमान नीला नजर आता है।
फिर ऑस्ट्रेलिया का आसमान लाल कैसे हुआ?
जब साइक्लोन नरेल पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया की तरफ बढ़ रहा था, तो उसकी तेज हवाओं ने ‘आउटबैक’ (ऑस्ट्रेलिया का विशाल रेतीला और सूखा इलाका) से भारी मात्रा में धूल उड़ाई।
इस धूल में ‘हेमाटाइट’ (Hematite) यानी आयरन ऑक्साइड की मात्रा बहुत ज्यादा होती है। हेमाटाइट वही लाल जंग है जो लोहे पर चढ़ती है।
जब हवा में धूल जैसे बड़े कण तैरने लगते हैं, तो एक अलग प्रक्रिया शुरू होती है जिसे ‘माई स्कैटरिंग’ (Mie scattering) कहते हैं।
लोहे से भरी यह लाल धूल हवा में एक बड़े फिल्टर की तरह काम करने लगी। इसने नीले और हरे रंग की रोशनी को पूरी तरह रोक दिया और सिर्फ लाल रंग की लंबी वेवलेंथ को हमारी आंखों तक पहुंचने दिया। इसी विज्ञान ने आसमान को खून जैसा लाल बना दिया।
“हर चीज धूल से ढकी हुई है”
जमीन पर लोगों का अनुभव बेहद डरावना था। शार्क बे कारवां पार्क ने इस नजारे का वीडियो शेयर करते हुए Facebook पर लिखा, “बाहर का नजारा बहुत खौफनाक है और हर चीज धूल से ढकी हुई है।”
एक्स (X) पर भी इसके वीडियो तेजी से वायरल हुए। एक यूजर ने लिखा, “आसमान सच में खून जैसा लाल हो गया… यह सिर्फ एक तूफान नहीं है। यह याद दिलाता है कि प्रकृति के पास ऐसी ताकत है जिसे हम कंट्रोल नहीं कर सकते।”
क्वींसलैंड के प्रीमियर डेविड क्रिसाफुली ने इसे ऐतिहासिक बताया। उन्होंने कहा, “कई लोगों के लिए यह उनकी जिंदगी की सबसे तेज हवाओं का अनुभव रहा होगा।”
समुद्र और पर्यावरण पर सीधा असर
इस लाल आसमान ने सिर्फ लोगों को डराया नहीं। हवा में घुली धूल ने सेहत और पर्यावरण दोनों पर सीधा असर डाला।
हवा में इतनी ज्यादा धूल और खनिज कणों के होने से एयर क्वालिटी बहुत खराब हो जाती है। यह सांस की बीमारियों का कारण बन सकती है और ट्रांसपोर्ट के लिए विजिबिलिटी को खतरनाक स्तर तक गिरा देती है।
समुद्री वैज्ञानिक अब इस बात पर नजर रख रहे हैं कि लोहे से भरी यह भारी धूल जब हिंद महासागर में गिरेगी तो क्या बदलाव आएंगे। यह धूल समुद्र में ‘न्यूट्रिएंट साइकिल’ को ट्रिगर कर सकती है, जिसमें खनिज सीधे तौर पर समुद्री जीवों और मछलियों की फूड चेन का हिस्सा बन जाते हैं।
वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तूफान का असर सिर्फ जमीन तक सीमित नहीं रहेगा — हिंद महासागर का समुद्री जीवन भी इसकी चपेट में आ सकता है।

