Nature Communications में प्रकाशित नए शोध के अनुसार, लॉन्गवेव विकिरण पर धूल का प्रभाव +0.25 W m⁻² है, जो मौजूदा जलवायु मॉडलों के अनुमान से लगभग दोगुना है।
रेगिस्तानी धूल पृथ्वी को जलवायु मॉडल के अनुमान से लगभग दोगुना अधिक गर्म करती है। यह निष्कर्ष जैस्पर एफ. कोक (Jasper F. Kok), Department of Atmospheric and Oceanic Sciences, UCLA के नेतृत्व में हुए शोध का है। यह अध्ययन 28 अप्रैल 2026 को Nature Communications में प्रकाशित हुआ।
अध्ययन के अनुसार, धूल लॉन्गवेव विकिरण (longwave radiation) का प्रकीर्णन और अवशोषण करके पृथ्वी को गर्म करती है। यह ताप प्रभाव +0.25 ± 0.06 W m⁻² (90% विश्वास अंतराल) आंका गया है। वर्तमान जलवायु मॉडल इस गर्मी को औसतन केवल 0.13 (0.09–0.23) W m⁻² के आसपास आंकते हैं।
इस अंतर का मुख्य कारण है अधिकांश जलवायु मॉडलों में लॉन्गवेव प्रकीर्णन (longwave scattering) की अनदेखी। ये मॉडल इसे अपनी रेडिएटिव ट्रांसफर स्कीम (विकिरण स्थानांतरण योजना) में शामिल नहीं करते। इसके साथ ही, वे 10 माइक्रोमीटर से बड़े सुपर कोर्स डस्ट (super coarse dust) कणों का सही प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं।
शोधपत्र के अनुसार, इन चूकों से मॉडल सतह ऊर्जा प्रवाह (surface energy fluxes), बादलों की प्रतिक्रियाओं, वर्षा (precipitation) और वायुमंडलीय परिसंचरण का गलत आकलन करते हैं।
इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने डेटा-संचालित विश्लेषणात्मक मॉडल (data-driven analytical model) का उपयोग किया। इस मॉडल ने डस्टकॉम (DustCOMM) डेटा सेट से प्राप्त धूल के आकार और बहुतायत को रिमोट सेंसिंग डेटा के साथ जोड़ा।
विश्लेषण में स्पष्ट-आसमान (clear-sky) स्थितियों के तहत वायुमंडल के शीर्ष पर लॉन्गवेव प्रभाव का वैश्विक औसत 0.32 ± 0.08 W m⁻² मापा गया।
प्रकीर्णन और अवशोषण का प्रभाव
लॉन्गवेव प्रकीर्णन का प्रभाव बहुत बड़ा है। यह कुल लॉन्गवेव डस्ट एरोसोल ऑप्टिकल डेप्थ (LW DAOD) के लगभग 51 प्रतिशत (जो 16 से 60 प्रतिशत के बीच हो सकता है) हिस्से के लिए जिम्मेदार है। कुल लॉन्गवेव प्रभाव में इसका योगदान लगभग 57 प्रतिशत (21 से 66 प्रतिशत के बीच) है।
प्रकीर्णन (scattering) से उत्पन्न गर्मी अवशोषण (absorption) की तुलना में अधिक प्रभावी होती है। प्रकीर्णन और अवशोषण से उत्पन्न वैश्विक लॉन्गवेव प्रभाव क्रमशः 33 ± 7 और 26 ± 7 W m⁻² प्रति इकाई लॉन्गवेव एरोसोल ऑप्टिकल डेप्थ हैं।
यह उच्च दक्षता इसलिए होती है क्योंकि लगभग 28 ± 3 प्रतिशत प्रकीर्णन इंटरैक्शन डाउन-स्कैटरिंग (down-scattering) में परिणत होते हैं। यह प्रक्रिया विकिरण को रोककर पृथ्वी की ओर वापस भेज देती है, जिससे बाहरी लॉन्गवेव विकिरण कम हो जाता है।
कणों के आकार का भी इस हीटिंग पर सीधा असर पड़ता है। 2.5 से 10 माइक्रोमीटर के बीच के मोटे कण लॉन्गवेव प्रभाव में लगभग 65 प्रतिशत का योगदान देते हैं।
वहीं, 10 से 62.5 माइक्रोमीटर के बीच के सुपर कोर्स कण इस प्रभाव में लगभग 20 प्रतिशत जोड़ते हैं। कई जलवायु मॉडल इन सुपर कोर्स कणों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर देते हैं, जिससे हीटिंग का प्रभाव कम दर्ज होता है।
इस निष्कर्ष को Ryder et al. (2019) के शोध से समर्थन मिलता है। उन्होंने सहारा के निर्यात क्षेत्रों में मोटे धूल कणों की व्यापक उपस्थिति दर्ज की थी।
अध्ययन में पाया गया कि लॉन्गवेव प्रकीर्णन का प्रभाव तापमान के अंतर से काफी हद तक स्वतंत्र होता है। जबकि लॉन्गवेव अवशोषण मुख्य रूप से धूल की परत और सतह के तापमान के अंतर पर निर्भर करता है।
मौसम और बादलों की भूमिका
धूल का हीटिंग प्रभाव हमेशा एक समान नहीं रहता। अध्ययन के अनुसार, जब धूल की परत के ऊपर घने बादल होते हैं, तो यह हीटिंग प्रभाव लगभग समाप्त हो जाता है।
लेकिन जब बादल धूल के नीचे होते हैं, तो यह हीटिंग को केवल मामूली रूप से कम करते हैं। रेगिस्तानी स्रोत क्षेत्रों में बादलों की कमी के कारण लॉन्गवेव प्रभाव में केवल 10-20 प्रतिशत की कमी आती है।
महासागरों जैसे दूरस्थ क्षेत्रों में, जहां बादल अधिक होते हैं, यह प्रभाव 40 से 60 प्रतिशत तक घट जाता है। कुल मिलाकर, बादलों के कारण वैश्विक लॉन्गवेव प्रभाव में केवल लगभग 20 प्रतिशत की गिरावट आती है।
ऑस्ट्रेलिया और पूर्वी एशिया जैसे स्रोत क्षेत्रों के पास यह प्रभाव सबसे अधिक दर्ज किया गया है। यहां धूल मुख्य रूप से स्थानीय होती है और इसके कण आकार में बड़े होते हैं।
क्षेत्रीय जलवायु और मानसून पर असर
लॉन्गवेव प्रभाव को कम आंकने से मौसम पूर्वानुमान में त्रुटियां आती हैं। मॉडल दिन के समय सतह की शीतलन का अधिक अनुमान लगाते हैं और रात के समय सतह की हीटिंग को कम आंकते हैं।
यह त्रुटि महासागरों और वनस्पति वाले क्षेत्रों में सतह के वाष्पीकरण को कम दर्शाती है। इसके परिणामस्वरूप क्षेत्रीय वर्षा और बादलों की स्थिरता के अनुमान में भी कमी आती है।
धूल की लॉन्गवेव हीटिंग और शॉर्टवेव कूलिंग के बीच एक संतुलन काम करता है। लॉन्गवेव विकिरण स्रोत क्षेत्रों के पास भारी गर्मी पैदा करता है।
इसके विपरीत, शॉर्टवेव विकिरण महासागरों पर शीतलन पैदा करता है। इस द्विध्रुवीय पैटर्न (dipole pattern) का प्रभाव भारतीय मानसून और उष्णकटिबंधीय परिसंचरण पर पड़ता है।
एक हालिया समीक्षा के अनुसार, शॉर्टवेव कूलिंग -0.40 ± 0.25 W m⁻² के बीच हो सकती है — यह अनिश्चितता बहुत अधिक है। इसलिए यह अभी भी अनिश्चित है कि ऐतिहासिक रूप से धूल ने मानवजनित ग्रीनहाउस वार्मिंग को बढ़ाया है या उसे कम किया है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, मशीन लर्निंग पैरामीटराइजेशन (machine learning parameterizations) इन लॉन्गवेव प्रभावों को मॉडलों में शामिल करने का एक संभावित कुशल मार्ग हो सकता है।
मुख्य तथ्य
- रेगिस्तानी धूल का लॉन्गवेव ताप प्रभाव: +0.25 ± 0.06 W m⁻² (90% विश्वास अंतराल)
- 24 जलवायु मॉडलों का संकलन: औसत अनुमान 0.13 (0.09–0.23) W m⁻²
- अंतर का मुख्य कारण: लॉन्गवेव प्रकीर्णन की अनदेखी — कुल LW DRE का लगभग 57% हिस्सा
- स्पष्ट-आसमान (clear-sky) स्थितियों में वैश्विक औसत: 0.32 ± 0.08 W m⁻²

