- थूथुकुडी में साल 2023 की भारी बारिश के बाद होलोसीन काल का फॉसिल बेड मिला है।
- जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ZSI) की टीम ने यहां से 104 वैज्ञानिक नमूने एकत्र किए हैं।
- ZSI की प्रारंभिक फील्ड रिपोर्ट के अनुसार यह स्थल 8,000 से 12,000 वर्ष पुराना हो सकता है।
- यह जीवाश्म स्थल वर्तमान समुद्री तटरेखा से करीब 5 से 7 किलोमीटर अंदर पाया गया है।
- शोधकर्ताओं ने सटीक आयु निर्धारण के लिए रेडियोकार्बन डेटिंग की सिफारिश की है।
तमिलनाडु के थूथुकुडी में साल 2023 की भारी बारिश के बाद जमीन से निकले अवशेषों की जांच में एक नया भूवैज्ञानिक स्थल सामने आया है।
जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ZSI) के वैज्ञानिकों की प्रारंभिक जांच सुझाव देती है कि यह एक प्राचीन फॉसिल बेड (जीवाश्म तल) है, जो 8,000 से 12,000 साल पुराने होलोसीन काल का हो सकता है।
केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि यह खोज भारत के क्वाटरनरी (Quaternary) जीवाश्म रिकॉर्ड को समृद्ध करती है।
मंत्री ने स्पष्ट किया कि इस स्थल के माध्यम से भारत की प्राचीन पारिस्थितिकी और जलवायु की स्थितियों को समझने में मदद मिलेगी।
क्वाटरनरी काल पिछले 2.6 मिलियन वर्षों का भूवैज्ञानिक इतिहास समेटे है। इसी काल का हिस्सा होलोसीन युग है, जो लगभग 11,700 वर्ष पहले अंतिम हिमयुग के समापन के साथ शुरू हुआ था।
साल 2023 में हुई मूसलाधार बारिश की वजह से थूथुकुडी के कई इलाकों में मिट्टी का तेज कटाव हुआ था। जमीन की ऊपरी परत हटने से नीचे दबे हुए जीवाश्म सतह पर आ गए।
इसके बाद स्थानीय प्रशासन ने वैज्ञानिक जांच के लिए संबंधित विभागों से संपर्क किया। थूथुकुडी प्रशासन के अनुरोध पर ZSI की एक टीम ने इस पूरे क्षेत्र का विस्तृत क्षेत्र सर्वेक्षण (field survey) किया।
ZSI की रिपोर्ट के अनुसार, यह जीवाश्म स्थल मुख्य रूप से पनाईयुर गांव और मुनियासामी कोविल के पास स्थित है।
इस वैज्ञानिक दल का नेतृत्व मुख्य लेखिका डोला रॉय ने किया। उनके साथ देबाश्री दाम, आर. चंद्रन, सी. रघुनाथन और धृति बनर्जी इस शोध टीम का हिस्सा थे।
इस वैज्ञानिक दल का नेतृत्व मुख्य लेखिका डोला रॉय ने किया। उनके साथ देबाश्री दाम, आर. चंद्रन, सी. रघुनाथन और धृति बनर्जी इस शोध टीम का हिस्सा थे।
वैज्ञानिकों ने सर्वेक्षण के दौरान इस स्थल से मोलस्का संघ के समुद्री अकशेरूकीय जीवों (मरीन इनवर्टेब्रेट्स) के 104 अलग-अलग नमूने एकत्र किए हैं।
इन जीवाश्मों में मुख्य रूप से बाइवाल्व्स और गैस्ट्रोपोड्स शामिल हैं, जो प्राचीन तलछटी संरचनाओं में गहराई से दबे हुए थे।
तटरेखा में बदलाव का संकेत
वर्तमान में यह जीवाश्म स्थल समुद्री तटरेखा से लगभग 5 से 7 किलोमीटर अंदर की तरफ स्थित है।
ZSI की रिपोर्ट सुझाव देती है कि यह क्षेत्र कभी उथले-समुद्री से लेकर एश्चुअरी (मुहाने) जैसी सेटिंग का हिस्सा था, जहां पानी का सामान्य प्रवाह मौजूद था।
भूविज्ञान विभाग, वीओ चिदंबरम कॉलेज, थूथुकुडी के विशेषज्ञ एंटनी रवींद्रन, जो इस ZSI अध्ययन में शामिल नहीं थे, ने इस खोज के भूवैज्ञानिक पहलू पर बात की है।
एंटनी रवींद्रन ने फरवरी 2024 में ANI को दिए एक साक्षात्कार में कहा: “पनाईयुर गांव के इस हिस्से में जो जीवाश्म और उपसतह भूवैज्ञानिक संरचनाएं मिली हैं, वे काफी विशिष्ट हैं।”
उन्होंने उसी साक्षात्कार में आगे कहा: “यह दर्शाता है कि प्राचीन समय में समुद्र तट अलग स्थान पर था और समुद्र के स्तर में वृद्धि के कारण यह पूरा इलाका कभी जलमग्न रहा होगा।”
संरक्षण और आगे की जांच
जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की टीम ने अब इस स्थल की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि बारिश की वजह से सतह पर आए जीवाश्म खुली हवा के संपर्क में रहने के कारण तेजी से नष्ट हो सकते हैं।
शोधकर्ताओं ने स्थानीय प्रशासन से इस पूरे क्षेत्र की घेराबंदी करने और इसे सुरक्षित रखने के लिए तत्काल उपाय करने की सिफारिश की है।

