वैज्ञानिकों के एक नए विश्लेषण से संकेत मिलता है कि पिछले दशक में पृथ्वी के गर्म होने की गति पहले की तुलना में काफी तेज़ हो गई है। 2024 में वैश्विक तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर से लगभग 1.52°C ऊपर दर्ज किया गया। हालांकि, वैज्ञानिकों के अनुसार किसी एक वर्ष का यह स्तर पार करना पेरिस समझौते की सीमा का आधिकारिक उल्लंघन नहीं माना जाता। वैज्ञानिक पत्रिका ‘जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स’ (Geophysical Research Letters) में प्रकाशित इस शोध ने 98% से अधिक सांख्यिकीय निश्चितता के साथ प्रमाणित किया है कि वार्मिंग की दर अब ऐतिहासिक औसत से लगभग दोगुनी हो चुकी है।
आंकड़ों की गवाही: 0.2°C से 0.35°C तक का सफर
अध्ययन में वैज्ञानिकों ने दुनिया भर के पांच प्रमुख तापमान रिकॉर्ड को एक साथ मिलाकर उनका सांख्यिकीय विश्लेषण किया। इस विश्लेषण से पता चलता है कि 1970 से 2015 के बीच पृथ्वी के गर्म होने की औसत दर 0.2°C प्रति दशक से कम थी।
लेकिन अब परिदृश्य बदल चुका है। पिछले एक दशक (2015-2024) में यह दर उछलकर लगभग 0.35°C प्रति दशक हो गई है। डेटा में यह तेजी लगभग 2013-2014 के आसपास स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगती है। इस खतरे की गंभीरता को एक और आंकड़े से समझा जा सकता है: वैश्विक रिकॉर्ड के 10 सबसे गर्म वर्षों में से सभी 2015 के बाद के ही हैं।
प्राकृतिक प्रभावों को हटाकर निकाला गया विशुद्ध निष्कर्ष
अक्सर जलवायु परिवर्तन की बहसों में यह तर्क दिया जाता है कि तापमान में वृद्धि प्राकृतिक कारणों से हो रही है। इस भ्रम को दूर करने के लिए, डेटा से अल नीनो (El Niño), ज्वालामुखी विस्फोट और सूर्य की गतिविधि जैसे प्राकृतिक प्रभावों को अलग किया गया ताकि मानव-जनित वार्मिंग का वास्तविक संकेत स्पष्ट हो सके।
शोध के सह-लेखक और सांख्यिकीविद ग्रांट फोस्टर (Grant Foster) ने बताया कि डेटा में से प्राकृतिक कारकों का प्रभाव हटाने पर मानव-जनित वार्मिंग का दीर्घकालिक संकेत कहीं अधिक स्पष्टता से उभर कर सामने आया। उन्होंने स्पष्ट किया: “We can now demonstrate a strong and statistically significant acceleration of global warming since around 2015.”
इन प्राकृतिक प्रभावों को हटाने के बाद यह सामने आया कि 2015-2024 के दशक में हुए लगभग 1.24°C तापमान वृद्धि में से 1.22°C सीधे तौर पर मानवीय हस्तक्षेप का परिणाम है।
वार्मिंग में इस ‘त्वरण’ के प्रमुख कारण
आखिर 2013-14 के बाद ऐसा क्या हुआ कि वार्मिंग की दर अचानक इतनी बढ़ गई? वैज्ञानिकों का मानना है कि कई कारक इस त्वरण (Acceleration) में योगदान दे सकते हैं:
- जीवाश्म ईंधन का उत्सर्जन: कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) के उत्सर्जन में कोई सार्थक कमी नहीं आई है।
- सल्फर प्रदूषण की विडंबना: शिपिंग और उद्योगों से निकलने वाले सल्फर एयरोसोल का वातावरण पर एक अस्थायी कूलिंग प्रभाव होता था। जब वायु गुणवत्ता सुधारने के लिए इन्हें कम किया गया, तो वह कूलिंग प्रभाव भी खत्म हो गया, जिससे छिपी हुई गर्मी सतह पर आ गई।
- ऊर्जा असंतुलन: पृथ्वी की ऊर्जा का असंतुलन लगातार बढ़ रहा है, जहाँ अतिरिक्त गर्मी का 90% से अधिक हिस्सा हमारे महासागर सोख रहे हैं।
इसके अतिरिक्त, इस बढ़ती गर्मी के कारण ग्रीनलैंड की बर्फ की चादरें प्रति वर्ष लगभग 279 बिलियन टन की दर से द्रव्यमान खो रही हैं।
वैज्ञानिक अनिश्चितताएं और विरोधी दृष्टिकोण
हालांकि नया डेटा एक स्पष्ट वार्मिंग ट्रेंड दिखाता है, जलवायु विज्ञान में हमेशा कुछ अनिश्चितताएं मौजूद रहती हैं। कुछ विशेषज्ञ ‘डिकेडल वेरिएबिलिटी’ (10-20 साल के प्राकृतिक महासागरीय चक्र) का तर्क देते हैं।
यह अभी भी वैज्ञानिक जांच का विषय है कि क्या यह नया 0.35°C का ट्रेंड अगले दो दशकों तक स्थिर रहेगा, या प्राकृतिक चक्रों (जैसे PDO या AMO) के कारण इसमें फिर से कोई बदलाव आएगा। साथ ही, पेरिस समझौते (Paris Agreement) के उल्लंघन की वैज्ञानिक परिभाषा किसी एक वर्ष के ‘स्पाइक’ पर नहीं, बल्कि 20 वर्षों के दीर्घकालिक औसत पर आधारित होती है।
निष्कर्ष: 2030 से पहले की चुनौती
जलवायु परिवर्तन की यह गति अब एक स्थिर, अनुमानित रफ्तार नहीं रही—पिछले एक दशक में इसने स्पष्ट रूप से त्वरण का रूप ले लिया है। पोट्सडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च के शोधकर्ता और इस अध्ययन के प्रमुख लेखक स्टीफन रामस्टॉर्फ (Stefan Rahmstorf) के अनुसार, पृथ्वी के गर्म होने की आगामी गति अंततः इस बात पर निर्भर करेगी कि विश्व जीवाश्म ईंधन से कार्बन उत्सर्जन को शून्य की ओर कितनी तेजी से ले जाता है।
यह शोध स्पष्ट संकेत देता है कि हाल के वर्षों में वार्मिंग की गति पहले की तुलना में काफी तेज़ हुई है। यदि यह तेजी इसी तरह जारी रहती है, तो वैज्ञानिकों का अनुमान है कि 2030 से पहले 1.5°C सीमा का दीर्घकालिक उल्लंघन संभव हो सकता है।

