1986 का साल था। दुनिया चेर्नोबिल की आग से सहमी हुई थी। उसी साल, अंटार्कटिका के एक कोने में बिना किसी शोर के एक बर्फ का पहाड़ टूटा और समुद्र में समा गया। किसी ने ज्यादा परवाह नहीं की। आज, 40 साल बाद, वह पहाड़ अपनी आखिरी सांसें ले रहा है — और अपने पीछे एक हैरान करने वाली कहानी छोड़ रहा है।
अंटार्कटिका के ‘फिल्चनर-रोने आइस शेल्फ’ (Filchner-Ronne Ice Shelf) से टूटे इस महाकाय आइसबर्ग को विज्ञान की दुनिया में A23a नाम दिया गया। लगभग 4,000 वर्ग किलोमीटर में फैला और करीब एक ट्रिलियन टन वजनी यह बर्फ का टुकड़ा ग्रेटर लंदन से भी दोगुना बड़ा था। दशकों तक वेडेल सागर (Weddell Sea) के तल में फंसे रहने के बाद, इसने 2020 में अपना सफर दोबारा शुरू किया। आज यह दक्षिण अटलांटिक महासागर के गर्म पानी में टूटकर बिखर रहा है, लेकिन इसका अंत समंदर के एक बड़े हिस्से में जीवन का नया संचार कर रहा है।
A23a की ऐतिहासिक यात्रा: एक नज़र में
- 1986: अंटार्कटिका के फिल्चनर-रोने आइस शेल्फ से टूटकर अलग हुआ। वजन: लगभग 1 ट्रिलियन टन।
- 1986–2020: वेडेल सागर के कीचड़ भरे तल में धंसकर 34 साल तक एक ही जगह पर स्थिर रहा।
- 2020–2024: अचानक दोबारा तैरना शुरू किया और ‘आइसबर्ग एली’ (Iceberg Alley) के रास्ते उत्तर की ओर बढ़ा। रास्ते में ‘टेलर कॉलम’ (पानी के भीतर का प्राकृतिक भंवर) में फंसकर 8 महीने तक घूमता रहा।
- 2025–2026: भूमध्य रेखा की ओर बढ़ते हुए गर्म लहरों की चपेट में आया। जनवरी 2026 तक सिकुड़कर 506 वर्ग किलोमीटर और मार्च तक लगभग 180 वर्ग किलोमीटर रह गया।
अंदर से कैसे टूट रहा यह विशाल आइसबर्ग?
जैसे-जैसे A23a अंटार्कटिक ध्रुवीय धारा के सहारे उत्तर की ओर बढ़ा, गर्म हवाओं और समुद्री लहरों ने इसे तोड़ना शुरू कर दिया। इस विनाश के पीछे मुख्य वैज्ञानिक कारण ‘हाइड्रोफ्रैक्चरिंग’ (Hydrofracturing) है।
गर्मियों के दौरान बर्फ पिघलती है और इसके ऊपर नीले रंग के पानी के तालाब (Meltwater pools) बन जाते हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो बोल्डर के शोध वैज्ञानिक टेड स्कैम्बोस (Ted Scambos) बताते हैं कि यह पानी बर्फ की गहरी दरारों में भर जाता है और अपने भारी दबाव से पूरी संरचना को अंदर से फाड़ देता है।
वुड्स होल ओशनोग्राफिक इंस्टीट्यूशन की कैथरीन वॉकर (Catherine Walker) बताती हैं कि एक बार पानी बर्फ की भीतरी दरारों में घुस जाए, तो पूरा ढांचा अचानक ढह सकता है। इसी दबाव का नतीजा है कि हाल के हफ्तों में इससे कई बड़े टुकड़े अलग हो चुके हैं — इतने बड़े कि उन्हें अपने आधिकारिक नाम भी मिल गए हैं: A23g, A23h और A23i।
ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे के भौतिक समुद्र विज्ञानी एंड्रयू मेजर्स (Andrew Meijers) के मुताबिक, ज्यादातर आइसबर्ग इतनी दूर पहुंचते ही नहीं। “यह बड़ा था इसलिए बाकियों से ज्यादा टिका — लेकिन अंटार्कटिका का साया छूटते ही अंत तय हो जाता है,” उन्होंने स्पष्ट किया।
विनाश के बीच पनपा जीवन: नासा का खुलासा
कई रिपोर्ट्स आइसबर्ग के आकार और उसके टूटने पर केंद्रित हैं, लेकिन वैज्ञानिकों के लिए असली कहानी समुद्र के भीतर चल रही है।

25 जनवरी 2026 को नासा के Suomi NPP सैटेलाइट पर लगे VIIRS (Visible Infrared Imaging Radiometer Suite) उपकरण ने इस आइसबर्ग के टूटने की तस्वीरें कैद कीं। उसी दिन, नासा के PACE सैटेलाइट के ‘ओशन कलर इंस्ट्रूमेंट’ (OCI) ने बचे हुए बर्फ के टुकड़ों के चारों ओर ‘क्लोरोफिल-ए’ (Chlorophyll-a) के विशाल गुबार दर्ज किए। यह पानी में फाइटोप्लांकटन (Phytoplankton) की भारी मौजूदगी का पुख्ता वैज्ञानिक प्रमाण था।
यूनिवर्सिटी ऑफ शेफ़ील्ड के समुद्र विज्ञानी ग्रांट बिग (Grant Bigg) के अनुसार, यह ब्लूम (फाइटोप्लांकटन का खिलना) इतना विशाल है कि इसे सीधे तौर पर आइसबर्ग के पिघलने से जोड़ा जा सकता है।
लेकिन यह ब्लूम बन क्यों रहा है? यूनिवर्सिटी ऑफ कनेक्टिकट की समुद्र विज्ञानी हेइडी डियरसेन (Heidi Dierssen) इसे स्पष्ट करती हैं। उनके अनुसार, दक्षिण अटलांटिक के इस हिस्से में अमूमन सूरज की रोशनी और पोषक तत्वों की भारी कमी होती है। लेकिन A23a का पिघलता हुआ मीठा पानी सतह पर एक स्थिर परत बना रहा है और पानी में भारी मात्रा में आयरन (Iron), मैंगनीज और नाइट्रेट घोल रहा है। ये खनिज फाइटोप्लांकटन के लिए बेहतरीन ‘फर्टिलाइजर’ का काम कर रहे हैं, जिन्हें इस बर्फ ने सदियों पहले अंटार्कटिका की चट्टानों से रगड़कर अपने भीतर जमा किया था।
नासा की शोधकर्ता इवोना सेटिनिक (Ivona Cetinić) ने ‘MOANA’ टूल का इस्तेमाल कर यह पता लगाया कि इस ब्लूम में तेजी से पनपने वाले ‘पिकोयूकेरियोटिक फाइटोप्लांकटन’ और ‘सिनेकोकोकस’ (Synechococcus) सायनोबैक्टीरिया बहुतायत में मौजूद हैं। ये सूक्ष्मजीव पृथ्वी के ‘बायोलॉजिकल कार्बन पंप’ का अहम हिस्सा हैं, जो वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड खींचकर समुद्र की गहराइयों में दफन कर देते हैं।
कुदरत का खेल या बड़े खतरे की आहट?
आइसबर्ग का यह पिघलना और उससे जीवन का पनपना एक पारिस्थितिक फायदा लग सकता है, लेकिन इसके पीछे एक गंभीर चेतावनी भी छिपी है।
अंटार्कटिका से आइसबर्ग का टूटना (Calving) एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, लेकिन यह पूरी तरह से हानिरहित नहीं है। ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे के शोधकर्ताओं के अनुसार, अंटार्कटिका की आइस शेल्फ बढ़ते समुद्री तापमान के दबाव में कमजोर हो रही हैं — और उनका अध्ययन यह समझने के लिए जारी है कि आगे यह प्रक्रिया कितनी तेज हो सकती है।
यदि बड़ी आइस शेल्फ टूटती हैं, तो उनके पीछे रुके हुए मुख्य ग्लेशियर सीधे समुद्र में खिसकेंगे, जिससे वैश्विक जलस्तर (Sea level rise) में विनाशकारी वृद्धि हो सकती है। A23a का यह विघटन शोधकर्ताओं के लिए एक ‘लाइव लेबोरेटरी’ बन गया है, जो यह समझने में मदद कर रहा है कि भविष्य में बड़े ग्लेशियर कैसे ढहेंगे।
आगे क्या होगा A23a का?
A23a का मुख्य ढांचा अब तेजी से विघटित हो रहा है। यूएस नेशनल आइस सेंटर (US National Ice Center) के नियमों के अनुसार, जब कोई आइसबर्ग 70 वर्ग किलोमीटर से छोटा हो जाता है, तो उसकी आधिकारिक ट्रैकिंग बंद कर दी जाती है। मार्च की शुरुआत तक A23a इस सीमा के बेहद करीब पहुँच चुका है।
यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड के रिटायर्ड ग्लेशियोलॉजिस्ट क्रिस शुमन (Chris Shuman) सीधे कहते हैं — “यह इस गर्मी के मौसम को पार नहीं कर पाएगा।”
A23a जाएगा। नक्शे से इसका नाम हटेगा। लेकिन इसका पिघला पानी महीनों तक मछलियों, व्हेल और समुद्री पक्षियों को पोषण देता रहेगा। 40 साल का यह सफर खत्म हो रहा है — पर यह आइसबर्ग जाते-जाते भी खाली हाथ नहीं है।

