ईरान और अमेरिका के बीच दो महीने से जारी सैन्य टकराव ने वैश्विक खाद्य आपूर्ति को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं। भारत, ढाका और काहिरा जैसे देश और शहर इसकी सबसे पहली मार झेलने की कगार पर हैं।
संयुक्त राष्ट्र के विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP) ने पिछले महीने अपने विश्लेषण में एक गंभीर चेतावनी दी है। रिपोर्ट के अनुसार, अगर तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल से ऊपर रहती हैं और युद्ध मध्य-वर्ष तक खिंचता है, तो दुनिया भर में 4.5 करोड़ अतिरिक्त लोग गंभीर खाद्य संकट का सामना कर सकते हैं।
बॉन यूनिवर्सिटी के ‘सेंटर फॉर डेवलपमेंट रिसर्च’ के कार्यकारी निदेशक मतिन कैम का कहना है कि इसका सबसे ज्यादा असर अफ्रीका और एशिया पर पड़ेगा। उन्होंने अल जज़ीरा को बताया, “आने वाले महीनों में खाद्य कीमतों में निश्चित रूप से वृद्धि होगी।”
कैम ने आगे बताया कि इससे गरीब लोगों को सबसे ज्यादा नुकसान होगा क्योंकि वे अपनी आय का बड़ा हिस्सा भोजन पर खर्च करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि भूख और कुपोषण बढ़ने की संभावना बहुत अधिक है।
होर्मुज जलडमरूमध्य का संकट
नीति निर्माताओं की सबसे बड़ी चिंता यह है कि कृषि लागत में वृद्धि का असर बाज़ार तक कब पहुंचेगा। इसका मुख्य कारण होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही का बाधित होना है। इस अहम मार्ग से दुनिया का एक-तिहाई समुद्री उर्वरक और एक-चौथाई तेल गुजरता है।
खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) ने चेतावनी दी है कि इस मार्ग के बंद रहने से वैश्विक खाद्य ‘त्रासदी’ आ सकती है। एफएओ के अनुसार भारत, बांग्लादेश, श्रीलंका, सोमालिया, सूडान, तंजानिया, केन्या और मिस्र जैसे देश इस खतरे की अग्रिम पंक्ति में हैं।
एफएओ का अनुमान है कि अगर यह संकट जल्द नहीं सुलझा, तो 2026 की पहली छमाही में उर्वरक की कीमतें औसतन 20 प्रतिशत तक बढ़ सकती हैं। नॉर्थ डकोटा स्टेट यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञ सैंड्रो स्टीनबैक बाज़ार के मौजूदा रुझानों को लेकर सावधान करते हैं।
स्टीनबैक के अनुसार, पहले से खरीदे गए स्टॉक के कारण कीमतों का असर दिखने में समय लग सकता है। वह कहते हैं, “कृषि जैविक चक्र पर काम करती है, लेकिन उर्वरक और शिपिंग बाज़ारों की कीमतें कुछ ही दिनों या हफ्तों में बदल सकती हैं।”
बाज़ार के संकेत और ज़मीनी हकीकत
अब तक के आंकड़े काफी स्थिर रहे हैं। एफएओ के अनुसार, फरवरी की तुलना में पिछले महीने वैश्विक खाद्य कीमतों में केवल 2.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि अनाज की कीमतों में सिर्फ 1.5 प्रतिशत का इजाफा हुआ।
साल 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध और कोविड संकट के दौरान औसत कीमतों की तुलना में आज भी खाद्य कीमतें करीब 11 प्रतिशत कम हैं। इसके अलावा, शिकागो मर्केंटाइल एक्सचेंज पर व्यापारियों को इस साल के अंत तक गेहूं और मक्के की कीमतों में 4-5 प्रतिशत की मामूली बढ़ोतरी की उम्मीद है।
वर्तमान में वैश्विक स्तर पर अनाज उत्पादन अपने सर्वकालिक उच्च स्तर पर है। एफएओ का अनुमान है कि 2026 के कृषि सत्र के अंत तक अनाज का स्टॉक 95.15 करोड़ टन तक पहुंच जाएगा, जो पिछले साल की तुलना में 9 प्रतिशत अधिक है।
इटली के लेसे स्थित थिंक टैंक ‘फोंडाज़ियोन सीएमसीसी’ के शोधकर्ता शौरो दासगुप्ता बताते हैं कि बड़े आर्थिक सूचकांक गरीब परिवारों की वास्तविक कठिनाई को नहीं दर्शाते। उन्होंने कहा, “कम आय वाले देशों में ईंधन की कीमतें सीधे खाद्य कीमतों को प्रभावित करती हैं। नई फसल आने से पहले ही बढ़ती ऊर्जा लागत ढाका, काहिरा और लागोस में खाद्य बजट बिगाड़ रही है।”
2008 का अनुभव और भविष्य की चिंता
लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स की प्रोफेसर एलिजाबेथ रॉबिन्सन मानती हैं कि दुनिया 2007-08 के खाद्य संकट की तुलना में अब बेहतर स्थिति में है। उस समय गेहूं की कीमतें 135 प्रतिशत बढ़ने के बाद भारत, चीन, वियतनाम और यूक्रेन ने निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिए थे।
रॉबिन्सन कहती हैं कि मौजूदा स्थिति अलग है और अनाज बाज़ार बाधित नहीं हुए हैं, इसलिए अचानक बड़ी उछाल की चिंता नहीं है। ओवरसीज डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट के स्टीव विगिन्स भी मानते हैं कि किसान बदलती कीमतों और इनपुट उपलब्धता के अनुसार खुद को ढालने में माहिर होते हैं।
हालांकि, राजनयिक स्तर पर होर्मुज जलडमरूमध्य का समाधान जल्द निकलता नहीं दिख रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सोमवार को ब्लूमबर्ग न्यूज़ को दिए एक साक्षात्कार में संकेत दिया कि वह बुधवार को समाप्त हो रहे युद्धविराम को आगे बढ़ाने के पक्ष में नहीं हैं।
जॉर्ज डब्ल्यू. बुश के व्हाइट हाउस को सलाह दे चुकीं कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय की खाद्य सुरक्षा विशेषज्ञ कैथी बेलिस ने आगाह किया है। बेलिस ने कहा कि मार्च में ही कीमतें बढ़ती दिखी हैं और उनका अनुमान है कि अप्रैल के आंकड़े और खराब होंगे।
बेलिस ने अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा, “भले ही बुवाई का रकबा स्थिर रहे, लेकिन महंगी लागत के कारण उर्वरकों का कम इस्तेमाल होगा, जिससे खेतों की कुल पैदावार में गिरावट आ सकती है।”

