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क्या 9 करोड़ साल पहले 19 मीटर लंबे विशालकाय ऑक्टोपस महासागरों के शीर्ष शिकारी थे?

क्रिटेशियस काल के विशालकाय पंखदार ऑक्टोपस 'नानाइमोटीथिस' (Nanaimoteuthis) का एक कलात्मक चित्रण। 'साइंस' पत्रिका के हालिया शोध के अनुसार, यह प्राचीन समुद्री जीव आकार में 19 मीटर तक लंबा हो सकता था। (Yohei Utsuki/Hokkaido University)

विज्ञान पत्रिका ‘साइंस’ (Science) में 23 अप्रैल 2026 को प्रकाशित एक नए शोध के अनुसार, प्राचीन महासागरों में 19 मीटर तक लंबे ऑक्टोपस शीर्ष शिकारी रहे होंगे। जापान और कनाडा के जीवाश्मों का यह विश्लेषण समुद्री खाद्य श्रृंखला की पुरानी धारणाओं को सीधे चुनौती देता है।

यह अध्ययन होक्काइडो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता शिन इकेगामी और यासुहीरो इबा के नेतृत्व में किया गया है। टीम ने ‘नानाइमोटीथिस’ (Nanaimoteuthis) जीनस की दो अलग-अलग प्रजातियों के कुल 27 जबड़ों का गहराई से वैज्ञानिक विश्लेषण किया है।

इनमें से 15 जीवाश्म पहले से ही संग्रहित थे, जिनका टीम द्वारा दोबारा अध्ययन किया गया। इसके अलावा 12 बिल्कुल नए जीवाश्म चट्टानों के भीतर से खोजे गए, जिससे इस शोध को एक मजबूत वैज्ञानिक आधार मिला।

विशालकाय आकार और दो अलग प्रजातियां

क्रिटेशियस काल के प्राचीन ऑक्टोपस ‘नानाइमोटीथिस जेलेत्ज़की’ (A) और ‘नानाइमोटीथिस हैगार्टी’ (B) के विशालकाय निचले जबड़ों के जीवाश्म। दाईं ओर (C) आधुनिक विशालकाय स्क्विड का जबड़ा है। शोध के अनुसार, N. haggarti का जबड़ा इससे करीब 1.5 गुना अधिक बड़ा था। A और B के किनारों पर कड़े शिकार को कुचलने से हुई घिसावट के स्पष्ट निशान देखे जा सकते हैं।

शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि ये जीवाश्म दो अलग-अलग समयकालों और प्रजातियों के हैं। ‘नानाइमोटीथिस हैगार्टी’ (N. haggarti) प्रजाति करीब 8.6 से 7.2 करोड़ साल पहले के महासागरों में पाई जाती थी।

इस प्रजाति के ऑक्टोपस की कुल लंबाई 6.6 से 18.6 मीटर के बीच रही होगी। यह विशाल आकार इन्हें अब तक खोजे गए सबसे बड़े अकशेरुकी जीवों (invertebrates) में से एक माना जा सकता है।

दूसरी प्रजाति ‘नानाइमोटीथिस जेलेत्ज़की’ (N. jeletzkyi) इससे भी पुरानी है, जो करीब 10 करोड़ साल पहले समुद्रों में मौजूद थी। इस प्रजाति की लंबाई तुलनात्मक रूप से कम थी, जिसे 2.8 से 7.7 मीटर के बीच आंका गया है।

आज के समय में पाए जाने वाले विशालकाय स्क्विड (Giant Squid) की अधिकतम लंबाई लगभग 12 मीटर तक होती है। शोध के अनुसार नानाइमोटीथिस हैगार्टी का जबड़ा इस आधुनिक विशालकाय स्क्विड के जबड़े से करीब 1.5 गुना अधिक बड़ा था।

डिजिटल माइनिंग तकनीक का उपयोग

ऑक्टोपस के शरीर में हड्डियां नहीं होती हैं, इसलिए प्राकृतिक रूप से उनके जीवाश्म आसानी से नहीं बन पाते। उनके मुलायम शरीर का केवल एक ही हिस्सा करोड़ों सालों तक सुरक्षित रह पाता है, और वह है काइटिन (chitin) से बना उनका कठोर जबड़ा।

चट्टानों में गहराई तक दबे 12 नए जबड़े खोजने के लिए वैज्ञानिकों ने ‘डिजिटल फॉसिल माइनिंग’ नाम की एक अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया। इस जटिल प्रक्रिया में हाई-रेजोल्यूशन ग्राइंडिंग टोमोग्राफी के साथ एक विशेष एआई (AI) मॉडल की मदद ली गई।

शोधकर्ता यासुहीरो इबा ने नेशनल जियोग्राफिक (National Geographic) को बताया कि यह तकनीक चट्टानों के अंदर छिपे जीवाश्मों को ढूंढने में बेहद कारगर रही। उनके मुताबिक, पारंपरिक तरीकों और खुदाई से इन जीवाश्मों को खोजना लगभग असंभव काम था।

जीवाश्मों के इन नए नमूनों से ऑक्टोपस के उत्पत्ति रिकॉर्ड को करीब 50 लाख साल पीछे धकेल दिया गया है। इसके साथ ही, पंखों वाले ऑक्टोपस (Cirrata) का इतिहास भी अब 1.5 करोड़ साल और पुराना साबित हुआ है।

शिकार के तरीके और जबड़े की घिसावट

शोधकर्ताओं को जीवाश्म जबड़ों के किनारों पर खरोंच और भारी घिसावट के स्पष्ट निशान मिले हैं। यह इस बात का मजबूत संकेत है कि ये प्राचीन ऑक्टोपस कड़े आवरण वाले जीवों और हड्डियों को कुचलकर खाते थे।

कुछ बड़े जबड़ों में घिसावट इस हद तक थी कि उनकी कुल लंबाई का लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा तक नष्ट हो चुका है। दोनों ही प्रजातियों के नमूनों में जबड़े का दाहिना किनारा बाएं हिस्से के मुकाबले अधिक घिसा हुआ पाया गया।

वैज्ञानिक इस तरह की असंतुलित घिसावट को ‘लेटरलाइज्ड बिहेवियर’ (lateralized behavior) का संकेत मानते हैं। जीव विज्ञान में इस विशेष व्यवहार को उच्च स्तरीय बुद्धिमत्ता और उन्नत संज्ञानात्मक क्षमता की ओर सीधा इशारा माना जाता है।

यासुहीरो इबा ने सीएनएन को बताया कि क्रिटेशियस महासागरों में इतने बड़े और पारिस्थितिक रूप से महत्वपूर्ण जीव को खोजना उम्मीदों से परे था। उनका मानना है कि इन जीवों ने अपने शिकार को पकड़ने के लिए अपनी बुद्धिमत्ता का पूरा इस्तेमाल किया होगा।

बाहरी विशेषज्ञों का संदेह और वैज्ञानिक राय

हालांकि, कई बाहरी वैज्ञानिक इस जीव को बिना प्रत्यक्ष सबूत के शीर्ष शिकारी मानने से अभी भी परहेज कर रहे हैं। ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर याकोब विंथर ने कहा कि यह जीवाश्म निश्चित रूप से साबित नहीं करता कि वे मोसासौर जैसे बड़े जानवरों का शिकार करते थे।

विंथर ने सीएनएन से बातचीत में स्पष्ट किया कि इन विशाल ऑक्टोपस के लिए इतने बड़े शिकार को पकड़ना बिल्कुल भी जरूरी नहीं था। वे आकार में छोटे शिकार खाकर भी अपने शरीर की विशाल ऊर्जा जरूरतें पूरी कर सकते थे।

अलाबामा यूनिवर्सिटी के जीवाश्म विशेषज्ञ एडियल क्लोम्पमेकर ने भी इस दावे पर सावधानी बरतने की सलाह दी है। उन्होंने नेशनल जियोग्राफिक को बताया कि इन दावों की ठोस पुष्टि के लिए पेट की सामग्री या हड्डियों पर दांत के स्पष्ट निशान जैसे साक्ष्य चाहिए।

क्लोम्पमेकर ने यह सवाल भी उठाया कि क्या वे वास्तव में समुद्री सरीसृपों का शिकार कर रहे थे या फिर केवल शार्क और मछलियों को ही अपना भोजन बना रहे थे। ठोस प्रमाणों के अभाव में यह सवाल अभी भी वैज्ञानिक शोध का विषय बना हुआ है।

अभिसारी विकास और भविष्य की योजनाएं

समुद्री शीर्ष शिकारियों में ‘अभिसारी विकास’ (Convergent Evolution) को दर्शाता एक वैज्ञानिक कालरेखा आरेख। यह स्पष्ट करता है कि कैसे कशेरुकी जीवों (ऊपर) और ऑक्टोपस जैसे बिना रीढ़ वाले जीवों (नीचे) ने अलग-अलग कालखंडों में गति और आकार बढ़ाने के लिए अपने सुरक्षात्मक आवरण त्याग दिए।

इस अध्ययन में एक महत्वपूर्ण विकासवादी पहलू पर भी प्रकाश डाला गया है जिसे विज्ञान में अभिसारी विकास (convergent evolution) कहा जाता है। ऑक्टोपस और कशेरुकी जीवों (vertebrates), दोनों ने अलग-अलग कालखंडों में, लेकिन एक जैसी विकासवादी रणनीति के तहत, अपने सुरक्षात्मक आवरण त्याग दिए थे।

सुरक्षात्मक आवरण हटने से उनकी गति, शरीर का आकार और बुद्धिमत्ता, तीनों में वृद्धि हुई। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के प्राणीशास्त्र के प्रोफेसर टिम कोल्सन ने सीएनएन को बताया कि यह शोध कार्य काफी सम्मोहक (compelling) है।

कोल्सन के अनुसार इन जीवों का विशाल आकार यह संकेत देता है कि वे यकीनन शीर्ष शिकारी रहे होंगे। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि वर्तमान साक्ष्यों के आधार पर उनकी बुद्धिमत्ता का सटीक स्तर मापना अभी पूरी तरह से संभव नहीं है।

इबा का मानना है कि ऐसे शोध प्राचीन समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र की जटिलताओं को समझने में बड़ी मदद करते हैं। वे भविष्य में अपनी डिजिटल फॉसिल माइनिंग तकनीक को और अधिक विस्तार देना चाहते हैं।

उनका मुख्य लक्ष्य इस डिजिटल तरीके से उन जीवों को खोजना है जो अब तक जीवाश्म रिकॉर्ड में हमारी नजरों से छिपे रहे हैं। इससे प्राचीन पारिस्थितिकी तंत्र के काम करने के तरीके की एक अधिक स्पष्ट और सटीक तस्वीर दुनिया के सामने आ सकेगी।

By Muhammad Sultan

मैं मुहम्मद सुल्तान हूँ, एक पैशनेट न्यूज़ राइटर। 'Global Update Today' के ज़रिए मेरी कोशिश रहती है कि दुनिया के हर कोने से साइंस, स्पेस और करंट अफेयर्स की वो ख़बरें आप तक लाऊँ, जो आपके लिए जानना ज़रूरी हैं। मेरी लिखी ख़बरों में आपको हमेशा डीप रिसर्च और आसान भाषा मिलेगी।

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