गर्मियों में जब हम पहाड़ों की तरफ देखते हैं, तो बर्फ से ढकी चोटियां हमें सुकून देती हैं। लेकिन ऑस्ट्रिया के आल्प्स पर्वतों से यह बर्फ बहुत तेज़ी से गायब हो रही है।
ऑस्ट्रियन अल्पाइन क्लब की मॉनिटरिंग टीम ने शुक्रवार को अपने ताज़ा आंकड़े साझा किए। इस डेटा के अनुसार देश में निगरानी किए जा रहे 96 ग्लेशियरों में से 94 पिछले दो वर्षों में पीछे हटे हैं। क्लब ने इस स्थिति को एक “dramatic development” करार दिया है, जो जलवायु परिवर्तन के असर को साफ तौर पर दिखाता है।
पहाड़ों पर मापी गई 100 मीटर की दूरी
रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि पश्चिमी टायरोल क्षेत्र में स्थित ‘एल्पाइनर फेर्नर’ (Alpeiner Ferner) और साल्ज़बर्ग क्षेत्र के ‘स्टुबैकर सोनब्लिककीज़’ (Stubacher Sonnblickkees) ग्लेशियर की लंबाई 100 मीटर (लगभग 330 फीट) से ज्यादा पीछे चली गई है। अगर हम सभी 94 सिकुड़ते ग्लेशियरों का औसत निकालें, तो हर ग्लेशियर 20 मीटर (65 फीट) से अधिक पीछे खिसका है।
सबसे बड़े ग्लेशियर का टूटता हुआ हिस्सा
ऑस्ट्रिया का सबसे बड़ा ग्लेशियर ‘पास्टर्ज़’ (Pasterze) भी इस मार से सुरक्षित नहीं है। इसका निचला हिस्सा जिसे वैज्ञानिक ‘ग्लेशियर टंग’ कहते हैं, धीरे-धीरे टूट रहा है। यह बदलाव अब पहाड़ों पर साफ दिखाई देने लगा है। ग्लेशियर लगातार सिकुड़ रहे हैं। उनकी लंबाई घट रही है, फैलाव कम हो रहा है और कुल बर्फ भी घटती जा रही है।
पीने के पानी और खेती पर सीधा असर
पहाड़ों की बर्फ पिघलने का प्रभाव सिर्फ दृश्यों तक सीमित नहीं है। इस बदलाव का सीधा असर पीने के पानी, बिजली उत्पादन और खेती पर पड़ेगा। इसके साथ ही बुनियादी ढांचे और पहाड़ों पर पर्यटन से जुड़ी मनोरंजक गतिविधियों को भी नुकसान पहुंचेगा।
गर्म हवाएं और बर्फबारी की कमी का नतीजा
ग्लेशियरों के इस तरह पीछे हटने के पीछे खराब मौसम मुख्य कारण रहा है। पहाड़ों पर बर्फबारी काफी कम हुई है और तापमान में लगातार वृद्धि देखी गई है। पिछले साल का जून महीना सामान्य से बहुत अधिक गर्म था। उस दौरान तापमान औसत से लगभग 5 डिग्री सेल्सियस (9 डिग्री फारेनहाइट) ऊपर दर्ज किया गया था। इतनी भीषण गर्मी ने ग्लेशियरों के पीछे हटने की गति को बढ़ा दिया।
135 सालों का इतिहास और वैश्विक स्थिति
ऑस्ट्रिया में ग्लेशियरों की स्थिति मापने का काम पिछले 135 वर्षों से चल रहा है। क्लब के अनुसार पिछले दो वर्षों की तुलना में वर्तमान दर थोड़ी कम है। इसके बावजूद यह 135 वर्षों के मापन इतिहास में ग्लेशियरों के पीछे हटने की आठवीं सबसे बड़ी घटना है।
यह कोई अकेली घटना नहीं है। पड़ोसी देश स्विट्जरलैंड जहां यूरोप के सबसे ज्यादा ग्लेशियर हैं, वहां भी यही रुझान हाल के वर्षों में दर्ज किया गया है। ग्लेशियरों का यह पीछे हटना दुनिया के दूसरे पहाड़ी इलाकों में भी देखा जा रहा है।
अब तैयारी और बचाव का समय है
ऑस्ट्रियन अल्पाइन क्लब की उपाध्यक्ष निकोल स्लुपेत्ज़की (Nicole Slupetzky) ने स्थिति की गंभीरता को स्पष्ट किया है। उन्होंने कहा, “ग्लेशियर पिघल रहे हैं और हर नई रिपोर्ट के साथ स्थिति की तात्कालिकता बढ़ रही है।”
स्लुपेत्ज़की साफ कहती हैं कि ग्लेशियरों को उनके पुराने स्वरूप में वापस लाना अब संभव नहीं है। अब एकमात्र सवाल यह है कि इंसान इस बदलाव के नुकसान को कैसे कम करे।
विशेषज्ञ इसे नीति-निर्माताओं और समाज के लिए एक चेतावनी मान रहे हैं। जल सुरक्षा और बुनियादी ढांचे को आने वाले समय में इन नई परिस्थितियों के अनुसार ढालने की तैयारी शुरू करनी होगी।

