साल 1985 में ब्रिटिश गैस ने उत्तरी सागर में तेल की तलाश के लिए एक कुआं खोदा था। उस ड्रिलिंग से निकले पत्थर के छोटे टुकड़े ब्रिटिश जियोलॉजिकल सर्वे की एक स्टोरेज फैसिलिटी में दशकों तक खामोशी से पड़े रहे।
साल 2022 में जब इन टुकड़ों को माइक्रोस्कोप के नीचे रखा गया, तब एक बहुत बड़ा सच सामने आया। ये पत्थर 4.3 करोड़ साल पहले के उस दिन के गवाह थे जब एक क्षुद्रग्रह ने इस पूरे सागर को हिलाकर रख दिया था।
भूवैज्ञानिकों ने आखिरकार उत्तरी सागर के नीचे दबे एक ऐसे क्रेटर का सच दुनिया के सामने रख दिया है जिसने विज्ञान जगत को दो दशकों तक उलझाए रखा था।
यॉर्कशायर के तट से दूर सिल्वरपिट की पहचान
इंग्लैंड के यॉर्कशायर तट से लगभग 130 किलोमीटर दूर समुद्र तल के नीचे एक विशाल गड्ढा मौजूद है। विज्ञान की दुनिया में इसे सिल्वरपिट क्रेटर कहा जाता है।
यह भूवैज्ञानिक संरचना समुद्र तल से लगभग 700 मीटर नीचे कीचड़ और गाद में दबी हुई है। साल 2002 में तेल उद्योग के एक भूकंपीय सर्वेक्षण के दौरान पहली बार इस जगह की पहचान हुई थी। तभी से इसके बनने की वजह को लेकर वैज्ञानिकों में बहस चल रही थी।
रिसर्च पेपर के अनुसार यह क्रेटर मुख्य रूप से 3.2 किलोमीटर चौड़ा है। इसके बाहर लगभग 18 किलोमीटर के दायरे में दरारों और टूटी चट्टानों का एक बड़ा क्षेत्र फैला हुआ है।
2009 का सार्वजनिक मतदान और वैज्ञानिक विवाद
इस गड्ढे की उत्पत्ति को लेकर वैज्ञानिक समुदाय दो खेमों में बंटा हुआ था। एक खेमे का मानना था कि यह क्षुद्रग्रह की टक्कर से बना है। दूसरे गुट ने इसे ज़मीन के नीचे नमक की परतों के खिसकने का परिणाम बताया।
कुछ वैज्ञानिकों ने ज्वालामुखी गतिविधि का तर्क भी दिया था। उस समय पुरानी भूकंपीय छवियां अधूरी थीं, इसलिए कोई ठोस जवाब नहीं मिल पाया।
साल 2009 में जियोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ लंदन ने इस मुद्दे पर एक सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित किया। यह कोई विशेषज्ञ पैनल नहीं था, बल्कि एक खुली बहस थी। इस बहस में मौजूद ज़्यादातर लोगों ने क्षुद्रग्रह थ्योरी के खिलाफ वोट किया और यह सवाल लगभग बंद मान लिया गया।
नई भूकंपीय तकनीक ने पलटा पुराना फैसला
एडिनबर्ग स्थित हेरियट-वाट यूनिवर्सिटी के डॉ. उइसडियन निकोलसन की टीम को साल 2022 में एक नए 3D भूकंपीय सर्वेक्षण का डेटा मिला। यह डेटा मूल रूप से एक कार्बन स्टोरेज प्रोजेक्ट के लिए जुटाया गया था।
इस नए डेटा ने पहली बार क्रेटर की पूरी संरचना को एकदम साफ कर दिया। क्रेटर के बीच में मौजूद जिस चट्टानी उभार को पहले केवल एक तकनीकी खामी माना गया था, वह असल में 200 मीटर ऊंचा एक वास्तविक भूवैज्ञानिक हिस्सा निकला।
क्रेटर की दरारों के पैटर्न ने यह भी साफ कर दिया कि क्षुद्रग्रह सीधे ऊपर से नहीं गिरा था। वह पश्चिम-उत्तरपश्चिम दिशा से बहुत कम कोण पर आकर समुद्र से टकराया था।
तेल के कुएं से निकला अंतिम और अचूक सबूत
केवल भूकंपीय छवियों से पूरी वैज्ञानिक प्रामाणिकता सिद्ध नहीं की जा सकती थी। टीम को क्रेटर के निर्माण का कोई ठोस खनिज प्रमाण चाहिए था।
शोधकर्ताओं ने क्रेटर के किनारे से सिर्फ एक किलोमीटर दूर स्थित उसी पुराने कुएं के पत्थरों की जांच की जो 1985 में निकाले गए थे। माइक्रोस्कोप से जांच करने पर उन्हें 463 मीटर की गहराई पर क्वार्ट्ज और 494 मीटर पर पोटेशियम फेल्डस्पार के कण मिले।
इन दोनों खनिजों में समानांतर धारियां मौजूद थीं। विज्ञान की भाषा में इन्हें शॉक लैमेली कहा जाता है।
अत्यधिक दबाव और शॉक लैमेली का विज्ञान
इन खनिजों में पाए गए शॉक लैमेली ने 10 से 13 गीगापास्कल (GPa) के भारी दबाव का संकेत दिया। यह दबाव रेंज पृथ्वी की किसी भी सामान्य प्राकृतिक प्रक्रिया में नहीं बन सकती।
इतना अत्यधिक दबाव केवल तेज़ गति से आने वाले क्षुद्रग्रह के टकराने पर ही बनता है।
डॉ. निकोलसन ने कहा कि उनकी टीम इन दुर्लभ कणों को पाकर बेहद भाग्यशाली थी। यह सच में भूसे के ढेर में सूई ढूंढने जैसा था। ये खनिज क्षुद्रग्रह के टकराने वाले सिद्धांत को बिना किसी संदेह के साबित करते हैं।
जीवाश्मों ने बताया 4.3 करोड़ साल पहले का समय
इन पत्थरों की ड्रिल कटिंग में मिले समुद्री सूक्ष्मजीवों के कैल्शियम कार्बोनेट कवच ने घटना का सटीक समय तय किया। 31 नमूनों की जांच में मध्य इओसीन काल के सूक्ष्मजीव पाए गए।
इन जीवाश्मों के आधार पर यह तय हुआ कि यह घटना आज से 4.3 करोड़ से 4.6 करोड़ साल पहले हुई थी।
उस समय की पृथ्वी आज से बिल्कुल अलग थी। अंटार्कटिका के ग्लेशियर अभी पूरी तरह नहीं बने थे और भारत की यूरेशिया से टक्कर हाल ही में हुई थी। उस समय ब्रिटेन के पास का यह सागर काफी उथला और खुला हुआ था।
12 सेकंड में बना क्रेटर
इंपीरियल कॉलेज लंदन के प्रोफेसर गैरेथ कॉलिन्स और यूनिवर्सिटी ऑफ एरिजोना की वेरोनिका ब्रे ने इस घटना का कंप्यूटर सिमुलेशन तैयार किया। इस मॉडलिंग में 160 मीटर चौड़े और भारी चट्टानी क्षुद्रग्रह का उपयोग किया गया।
वायुमंडल के घर्षण को ध्यान में रखने के बाद भी यह क्षुद्रग्रह लगभग 15 किलोमीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से समुद्र से टकराया। यह गति ध्वनि की गति से लगभग 44 गुना अधिक है।
इस तेज़ रफ्तार के कारण केवल 12 सेकंड के भीतर समुद्र तल में तीन किलोमीटर चौड़ा और एक किलोमीटर गहरा गड्ढा बन गया। टकराव के 30 सेकंड बाद क्रेटर के बीच का हिस्सा ऊपर उठने लगा। एक मिनट बाद समुद्र का पानी भारी ताकत के साथ वापस क्रेटर में घुसा और उसने किनारों को हमेशा के लिए बदल दिया।
100 मीटर ऊंची सूनामी
डॉ. निकोलसन ने हेरियट-वाट यूनिवर्सिटी के प्रेस बयान में बताया कि टक्कर के तुरंत बाद पानी और चट्टान का एक विशाल स्तंभ आसमान की ओर उठा और फिर वापस समुद्र में गिर गया।
टीम के कंप्यूटर सिमुलेशन मॉडल के अनुसार इस टक्कर से 100 मीटर से ऊंची सूनामी लहरें उठी होंगी। यह एक मॉडल-आधारित अनुमान है, कोई सीधे तौर पर मापा गया आंकड़ा नहीं।
क्रेटर के बाहर मिले छोटे गड्ढे
क्रेटर के बाहरी किनारे पर 50 से 150 मीटर चौड़े दर्जनों छोटे गड्ढे भी पाए गए। ये सेकेंडरी क्रेटर्स हैं जो टक्कर के दौरान हवा में उछले बड़े पत्थरों के वापस गिरने से बने थे।
रिसर्च पेपर के अनुसार यह पृथ्वी पर खोजा गया ऐसा पहला क्षेत्र है जहां इन छोटे गड्ढों को सीधे मुख्य क्रेटर से जोड़कर देखा जा सका है।
खड़िया मिट्टी का वाष्पीकरण और गैस का विस्फोट
क्रेटर के नीचे मौजूद खड़िया मिट्टी (चॉक) ने इस घटना को भूवैज्ञानिक रूप से और जटिल बना दिया। अत्यधिक गर्मी के कारण चॉक की चट्टानें गैस में बदलने की प्रक्रिया से गुज़रीं।
तापमान 750°C से ऊपर जाने पर कैल्शियम कार्बोनेट टूटकर ठोस कैल्शियम ऑक्साइड और कार्बन डाइऑक्साइड गैस में बदल जाता है।
रिसर्च पेपर के अनुसार क्रेटर के नीचे 0.9 से 2.2 क्यूबिक किलोमीटर चॉक की मात्रा गायब है। यह गायब हुआ हिस्सा कार्बन डाइऑक्साइड और भाप के एक बहुत बड़े विस्फोट की तरफ इशारा करता है। इसकी पूरी पुष्टि के लिए भविष्य में क्रेटर के भीतर वैज्ञानिक ड्रिलिंग की आवश्यकता है।
चिक्सुलब से तुलना और समुद्री क्रेटर की दुर्लभता
सिल्वरपिट को अक्सर मेक्सिको के चिक्सुलब क्रेटर के साथ रखकर देखा जाता है। चिक्सुलब क्रेटर डायनासोर के विनाश से जुड़ा है और सिल्वरपिट से करीब 2 करोड़ साल पुराना है।
सिल्वरपिट डायनासोर के विलुप्त होने के काफी समय बाद की घटना है। पृथ्वी पर ज़मीन के ऊपर लगभग 200 इम्पैक्ट क्रेटर मौजूद हैं। समुद्र के नीचे अब तक सिर्फ 33 की पहचान हो सकी है।
सिल्वरपिट उन्हीं में से एक है। यह दुनिया का केवल दूसरा ऐसा समुद्री क्रेटर है जिसे 3D भूकंपीय डेटा से पूरी तरह मैप किया जा सका है।
दशकों पुरानी वैज्ञानिक पहेली का जवाब
प्रोफेसर गैरेथ कॉलिन्स 2009 की उस खुली बहस में भी मौजूद थे जब क्षुद्रग्रह थ्योरी को नकार दिया गया था।
उन्होंने कहा कि उन्हें हमेशा से लगता था कि यह सिद्धांत सबसे सरल और सटीक व्याख्या थी। आखिरकार वह सबूत मिल गया जिसका इंतज़ार था। अब इस नए डेटा का उपयोग यह समझने के लिए किया जा सकता है कि अंतरिक्ष से आने वाली चट्टानें ग्रहों की सतह के नीचे कैसे बदलाव लाती हैं।
साल 1985 में खोदे गए उस कुएं से निकले पत्थरों ने 37 साल बाद एक बहुत बड़ी सच्चाई बयान कर दी।
सिल्वरपिट अब भूकंपीय मानचित्रों पर केवल एक अजीब आकार नहीं रह गया है। यह उस पूरी घटना का सुरक्षित रिकॉर्ड है जिसमें एक क्षुद्रग्रह टकराया, चट्टानें टूटीं, सूनामी उठी और फिर सब कुछ तलछट के नीचे 4.3 करोड़ सालों के लिए दब गया।

