अफ्रीका के दो टुकड़े होने की वैज्ञानिक कहानी: क्या बन रहा है एक नया महासागर?

2005 में इथियोपिया के अफार रेगिस्तान में आई 60 किलोमीटर लंबी दरार महाद्वीप के टूटने का एक बड़ा संकेत है।

हॉलीवुड की फिल्मों में दुनिया का अंत अक्सर एक झटके में होता है। ज़मीन फटती है। शहर डूब जाते हैं। और यह सब कुछ ही घंटों में।

लेकिन असल दुनिया में भूविज्ञान की रफ्तार बहुत धीमी है।

इस वाक्य को पढ़ने के दौरान ही, अफ्रीका महाद्वीप के दो टुकड़े होने की प्रक्रिया थोड़ी और आगे बढ़ चुकी है। उत्तरी इथियोपिया के अफार (Afar) क्षेत्र में धरती के नीचे कुछ ऐसा हो रहा है जो करोड़ों साल बाद दुनिया का नक्शा पूरी तरह बदल सकता है। वहां एक नया महासागर आकार ले रहा है।

इथियोपिया का अफार: धरती का सबसे अनोखा चौराहा

अफार का इलाका धरती की सबसे गर्म और सूखी जगहों में से एक है। गर्मियों में यहाँ का तापमान 50 डिग्री सेल्सियस (122 फारेनहाइट) को पार कर जाता है।

इसी इलाके में दानाकिल डिप्रेशन है, जहाँ ‘एर्टा एले’ ज्वालामुखी मौजूद है। इस ज्वालामुखी में दशकों पुरानी लावा की झील उबल रही है, जिसे स्थानीय लोग “नर्क का दरवाज़ा” कहते हैं।

आम इंसानों के लिए यह जगह किसी सज़ा से कम नहीं है, लेकिन वैज्ञानिकों के लिए यह एक खुली प्रयोगशाला है।

अफार वह जगह है जहाँ धरती की तीन बड़ी टेक्टोनिक प्लेट्स आपस में मिलती हैं। ये हैं नूबिया प्लेट, सोमालिया प्लेट और अरेबियन प्लेट। ये तीनों प्लेट्स धीरे-धीरे एक-दूसरे से दूर खिसक रही हैं।

जब ये प्लेट्स दूर जाती हैं, तो धरती के नीचे का मेंटल ऊपर उठता है। अगर यह प्रक्रिया पूरी होती है, तो यह पिघलकर एक नए महासागर का बेसिन बना सकता है।

2005 की वह दरार जिसने विज्ञान को चौंका दिया

सितंबर 2005 में अफार रेगिस्तान के निवासियों ने धरती को कांपते हुए महसूस किया। हवा में ज्वालामुखी की राख भर गई थी और ज़मीन फटने की आवाज़ें आ रही थीं।

महज़ 10 दिनों के भीतर, ज़मीन में 60 किलोमीटर लंबी एक दरार खुल गई। कुछ जगहों पर ज़मीन 8 मीटर तक चौड़ी हो गई थी।

जब भूवैज्ञानिक वहां पहुंचे, तो उन्हें एक महाद्वीप के बीच से टूटने का सबसे बड़ा सीधा सबूत मिला। यह कोई अचानक हुई घटना नहीं थी, बल्कि लगभग 3 करोड़ साल पहले शुरू हुई एक प्रक्रिया का हिस्सा था।

प्लेटों के खिसकने की असली रफ्तार

यह पूरी प्रक्रिया बेहद धीमी है। रेड सी और अदन की खाड़ी वाले रिफ्ट हर साल लगभग 15 मिलीमीटर की दर से खिसक रहे हैं।

यह गति हमारे नाखूनों के बढ़ने की रफ्तार से भी आधी है। वहीं, मेन इथियोपियन रिफ्ट की गति करीब 5 मिलीमीटर प्रति वर्ष है।

इतनी धीमी रफ्तार के कारण एक नया महासागर बनने में अभी लाखों साल लगेंगे। और यह भी पक्का नहीं है कि ऐसा होगा ही, क्योंकि उत्तरी अमेरिका में मिडकॉन्टिनेंट रिफ्ट जैसी दरारें अतीत में विफल भी हो चुकी हैं।

एक नए महासागर का जन्म

दानाकिल डिप्रेशन इस पूरी प्रक्रिया का सबसे उन्नत हिस्सा है। यह इलाका समुद्र तल से लगभग 125 मीटर नीचे है।

यहाँ की ज़मीन की परत खिंचाव के कारण इतनी पतली हो चुकी है कि अब यह महाद्वीपीय परत कम और महासागरीय परत जैसी ज़्यादा हो गई है।

वर्तमान में, इरीट्रिया में मौजूद केवल 20 मीटर ऊंची एक भौगोलिक रुकावट ही दानाकिल डिप्रेशन को लाल सागर के पानी से रोके हुई है।

जब यह रुकावट गिरेगी, तो अदन की खाड़ी और लाल सागर का पानी इस दरार में भर जाएगा। इससे एक नया अंतर्देशीय समुद्र बनेगा जो धीरे-धीरे एक नए महासागर में बदल जाएगा।

धरती के नीचे एक दिल की धड़कन

दशकों से वैज्ञानिक जानते थे कि अफार के नीचे से बेहद गर्म सामग्री का एक गुबार (Mantle Plume) ऊपर उठ रहा है।

जुलाई 2025 में ‘नेचर जियोसाइंस’ जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन के लिए दस अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के वैज्ञानिकों ने एक दशक से अधिक समय में इकट्ठे किए गए 130 ज्वालामुखीय चट्टान के नमूनों का विश्लेषण किया। स्वानसी यूनिवर्सिटी की भूवैज्ञानिक एम्मा वाट्स और उनकी टीम ने पाया कि यह गुबार एक स्थिर धार की तरह नहीं, बल्कि एक “धड़कन” (Pulse) की तरह काम करता है। पिघली हुई चट्टानें अलग-अलग रासायनिक गुणों के साथ लहरों की तरह ऊपर आती हैं।

यह पैटर्न तीनों दरारों पर अलग-अलग तरीके से काम कर रहा है। यह इस बात का सबूत है कि नीचे मौजूद गुबार ऊपर की प्लेटों की स्थिति के अनुसार अपनी प्रतिक्रिया बदल रहा है।

धीमी रफ्तार, बड़ी खोजें

ज़मीन के फटने से लाखों साल पुरानी तलछट बाहर आ रही है। यह मानव विकास के 50 लाख साल के इतिहास पर नई रोशनी डाल रही है।

जनवरी में ‘नेचर’ जर्नल में प्रकाशित एक शोध के अनुसार, अफार में 26 लाख साल पुराने मानव के एक विलुप्त रिश्तेदार पैरेन्थ्रोपस का जीवाश्म मिला है। ‘नटक्रैकर मैन’ कहलाने वाली यह प्रजाति पहले केवल अफ्रीका के दक्षिणी और पूर्वी हिस्सों जैसे केन्या में मिली थी। नया जीवाश्म किसी भी पिछले रिकॉर्ड से करीब 1,000 किलोमीटर उत्तर में मिला है।

लंदन के नेचुरल हिस्ट्री म्यूज़ियम के डॉ. फ्रेड स्पूर के अनुसार, यह खोज बताती है कि यह प्रजाति अनुमान से कहीं ज़्यादा अनुकूलनशील थी। पिछले अगस्त में भी यहाँ मानव पूर्वजों के 26 से 28 लाख साल पुराने जीवाश्म दांत मिले थे।

विज्ञान के लिए एक खुला लेंस

अफार का इलाका वैज्ञानिकों के लिए किसी खज़ाने से कम नहीं है। शोधकर्ता क्रिस्टोफर मूर इसे धरती की एकमात्र ऐसी जगह बताते हैं जहाँ एक महाद्वीप के महासागर में बदलने की प्रक्रिया को खुले आसमान के नीचे देखा जा सकता है।

नवंबर में अफार के लंबे समय से शांत पड़े हायली गुब्बी ज्वालामुखी के विस्फोट के बाद उठी राख इतनी ज्यादा थी कि उसने स्थानीय घास के मैदानों को ढक दिया और इसका असर भारत तक हवाई यात्रा पर देखा गया।

वैज्ञानिक इन ज्वालामुखियों और दरारों को और गहराई से समझना चाहते हैं। एम्मा वाट्स कहती हैं कि किसी भी विज्ञान की तरह, आप एक कदम आगे बढ़ाते हैं, और अभी भी बहुत लंबा रास्ता तय करना बाकी है।


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