समंदर की शांत लहरों को देखकर शायद ही कोई अंदाजा लगा सके कि इसके ठीक नीचे एक अकल्पनीय ऊर्जा आकार ले रही है। प्रकृति की सबसे बड़ी ताकतों में से एक, ज्वालामुखी, अक्सर खामोशी से अपनी तैयारी करते हैं।
जापान के तट से दूर समुद्र के भीतर कुछ ऐसा ही हो रहा है। करीब 7300 साल पहले जापान के किकाई काल्डेरा में एक भयानक विस्फोट हुआ था।
यह धरती के मौजूदा भूगर्भीय काल ‘होलोसीन युग’ (जो करीब 11,700 साल पहले शुरू हुआ था) का सबसे बड़ा ज्वालामुखी विस्फोट था। अब नई रिसर्च से पता चला है कि इस विशाल काल्डेरा के ठीक नीचे मौजूद मैग्मा रिज़र्वायर फिर से भर रहा है।
उथली गहराई पर मौजूद है मैग्मा रिज़र्वायर
पिछले 3900 सालों में इस काल्डेरा के भीतर 32 क्यूबिक किलोमीटर नया मैग्मा एक केंद्रीय लावा डोम के रूप में सतह पर आकर जम चुका है। लेकिन सतह के नीचे की कहानी इससे बिल्कुल अलग है।
वैज्ञानिकों ने पाया है कि सतह से 2.5 से 6 किलोमीटर की गहराई पर एक विशाल अंडरग्राउंड मैग्मा रिज़र्वायर मौजूद है। इस रिज़र्वायर का आकार एक ‘ट्रेपेज़ॉइड’ (समलंब) जैसा है। इसका मतलब है कि इसका आधार काफी चौड़ा है और ऊपरी हिस्सा तिकोना होने के बजाय चपटा है।

पुराने ढांचे में नया मैग्मा और तेज़ रफ्तार
हैरानी की बात यह है कि नया मैग्मा उसी पुराने रिज़र्वायर में जमा हो रहा है, जिससे 7300 साल पहले भयानक विस्फोट हुआ था। उस पुराने विस्फोट में 133 से 183 क्यूबिक किलोमीटर के बीच मैग्मा बाहर निकला था।
वैज्ञानिकों के अनुसार पिछले 3900 सालों में यहां नया मैग्मा भरने की औसत दर 8.2 क्यूबिक किलोमीटर प्रति हजार साल से भी अधिक रही है। रसायनों की जांच से यह बात भी पुख्ता हुई है कि हाल के ज्वालामुखीय गतिविधियों का मैग्मा 7300 साल पुराने मैग्मा से बिल्कुल अलग है।

(कोबे यूनिवर्सिटी) के जियोफिजिसिस्ट सीमा नोबुकाज़ू कहते हैं, “इसके आकार और जगह को देखते हुए यह साफ है कि यह वही मैग्मा रिज़र्वायर है जो पिछले विस्फोट के दौरान मौजूद था।” नोबुकाज़ू आगे बताते हैं, “इसका सीधा मतलब है कि लावा डोम के नीचे जो मैग्मा आज मौजूद है, वह संभवतः नया इंजेक्ट हुआ मैग्मा है।”
शोधकर्ताओं का स्पष्ट मानना है कि विशाल काल्डेरा विस्फोटों के विज्ञान को डिकोड करने के लिए भारी मात्रा में मैग्मा जमा होने की इस प्रक्रिया को बारीकी से समझना बेहद ज़रूरी है।
लहरों के नीचे सर्वे की तकनीकी चुनौती
समुद्र के नीचे मौजूद इस ज्वालामुखी को मापना आसान नहीं था। जापान एजेंसी फॉर मरीन-अर्थ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (JAMSTEC) के साथ मिलकर वैज्ञानिकों ने 175 किलोमीटर लंबी एक सर्वे लाइन तैयार की।
रिसर्च टीम ने ‘आर/वी कैमेई’ नाम के जहाज से समंदर में 39 ओशन बॉटम सीस्मोमीटर (OBS) गिराए। इसके बाद शक्तिशाली एयरगन से पानी के भीतर तेज़ कंपन पैदा किया गया, ताकि यह पता चल सके कि भूकंपीय तरंगें पृथ्वी की क्रस्ट के भीतर कैसे सफर करती हैं।
जब ये तरंगें पिघले हुए मैग्मा वाले हिस्से में प्रवेश करती हैं, तो उनकी गति धीमी हो जाती है। इसी वैज्ञानिक सिद्धांत पर इस विशाल अंडरवाटर रिज़र्वायर का 2D नक्शा तैयार किया गया।
टोबा और येलोस्टोन के लिए अहम सुराग
किकाई काल्डेरा की यह डीप-सी स्टडी दुनिया के अन्य खतरनाक सुपरवॉल्केनो को समझने में भी बेहद काम आ रही है। येलोस्टोन का आखिरी बड़ा विस्फोट 6.31 लाख साल पहले हुआ था, जिसने 1000 क्यूबिक किलोमीटर से अधिक राइयोलाइट बाहर निकाला था।
वहीं इंडोनेशिया के टोबा में 74 हजार साल पहले हुए महाविस्फोट ने करीब 5300 क्यूबिक किलोमीटर मैग्मा बाहर उगल दिया था।
आज भी येलोस्टोन के नीचे 3 से 8 किलोमीटर की गहराई में एक बड़ा मैग्मा चेंबर मौजूद है। दूसरी तरफ टोबा के नीचे यह मैग्मा चेंबर 5 से 11 किलोमीटर की गहराई पर स्थित है। यह नया ‘मैग्मा री-इंजेक्शन मॉडल’ इन सभी काल्डेरा के नीचे चल रही भूगर्भीय प्रक्रियाओं के साथ पूरी तरह मेल खाता है।
भविष्य की तैयारी
प्रोफेसर नोबुकाज़ू का लक्ष्य साफ है — “हम इस स्टडी में इस्तेमाल किए गए तरीकों को और परिष्कृत करना चाहते हैं। हमारा अंतिम लक्ष्य भविष्य के विशाल विस्फोटों के अहम संकेतों की निगरानी करने में सक्षम होना है।”
प्रकृति की इन विनाशकारी ताकतों को रोका तो नहीं जा सकता, लेकिन उन्हें बेहतर तरीके से समझा ज़रूर जा सकता है। बेहतर मॉनिटरिंग और इन भूगर्भीय हलचलों की गहरी समझ से ही भविष्य में समय रहते चेतावनी देना मुमकिन हो सकेगा।
क्या जमीन के नीचे की ये उन्नत मॉनिटरिंग तकनीकें हमें आने वाले प्राकृतिक खतरों से एक कदम आगे रख पाएंगी?
Reference:

