अंतरिक्ष से नज़र: NASA-ISRO के रडार ने बादलों के पार क्या देखा?

नवंबर 2025 में भारत और अमेरिका के जॉइंट 'निसार' मिशन द्वारा ली गई माउंट सेंट हेलेंस की रडार तस्वीर। यह सैटेलाइट बादलों के आर-पार देखकर जमीन की सतह को रंगों के जरिए दिखाता है। PIA26692 Credits: NASA/JPL-Caltech

अमेरिका के प्रशांत उत्तर-पश्चिम (Pacific Northwest) इलाके में आसमान घने बादलों से ढका था। जमीन पर खड़े होकर माउंट सेंट हेलेंस ज्वालामुखी की चोटी देखना उस दिन पूरी तरह नामुमकिन था।

लेकिन अंतरिक्ष की कक्षा में चक्कर लगा रहे ‘निसार’ की एक खास आंख उस दिन सब कुछ साफ देख रही थी। यह कोई आम कैमरा नहीं है। यह बादलों के अंधेरे को चीरकर सीधे ज़मीन की सतह को पढ़ता है।

10 नवंबर की वह अहम तस्वीर

10 नवंबर 2025 को अमेरिका और भारत के अर्थ सैटेलाइट ‘निसार’ (NISAR) ने यह तस्वीर खींची। यह कोई आम डिजिटल फोटो नहीं है, बल्कि एक सिंथेटिक अपर्चर रडार (SAR) इमेज है।

निसार का एल-बैंड (L-band) रडार इंस्ट्रूमेंट बादलों और खराब मौसम के आर-पार देखने की ताकत रखता है। इसने एक बहुत बड़े इलाके को स्कैन किया, और यह तस्वीर उसी विशाल डेटा का एक हिस्सा है।

रंगों में छिपी ज़मीन की कहानी

इस तस्वीर में दिखने वाले रंग हमारी आम आंखों वाले रंग नहीं हैं। मैजेंटा (गहरा गुलाबी) रंग उन जगहों को दिखाता है जहां रडार के सिग्नल सड़कों और इमारतों जैसी सपाट सतहों से पूरी ताकत से टकराकर वापस आए।

पीला और हल्का हरा रंग इस बात का सबूत है कि उस इलाके में घने जंगल, नमी और वेटलैंड्स मौजूद हैं।

सबसे दिलचस्प हिस्सा वह गहरा नीला रंग है। यह पानी या ज्वालामुखी की चोटी पर मौजूद बिल्कुल साफ और चिकने मैदानों को दर्शाता है।

पहाड़ की तलहटी में इंसानी दखल

पहाड़ की तलहटी पर नज़र डालें, तो वनस्पति के बीच चौकोर आकार के कुछ बैंगनी धब्बे दिख रहे हैं। ये बिल्कुल सटीक 90 डिग्री के कोण पर कटे हैं।

नासा के मुताबिक, अंतरिक्ष से दिखने वाले ये चौकोर निशान साफ बताते हैं कि ये इंसानों द्वारा बनाए गए हैं। ये उन जंगलों के निशान हैं जिन्हें या तो काटा गया है, या फिर पुराने काटे गए पेड़ों की जगह अब नई वनस्पति उग रही है।

भारत-अमेरिका का पहला जॉइंट रडार

निसार अपनी तरह का पहला ऐसा सैटेलाइट है जिसमें दो अलग-अलग वेवलेंथ (L-band और S-band) वाले रडार एक साथ लगे हैं। इसका सफल लॉन्च जुलाई 2025 में भारत के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से किया गया था।

इस प्रोजेक्ट में नासा की तरफ से कैल्टेक (Caltech) द्वारा प्रबंधित जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी (JPL) लीड कर रही है। अमेरिका ने इसका एल-बैंड रडार और विशाल एंटीना रिफ्लेक्टर तैयार किया है।

वहीं, भारत के इसरो (ISRO) ने स्पेसक्राफ्ट बस और एस-बैंड रडार बनाकर इस मिशन को पूरा किया है।

39 फीट का रडार

इस सैटेलाइट में ड्रम के आकार का एक विशाल रिफ्लेक्टर लगा है, जिसकी चौड़ाई 39 फीट (12 मीटर) है। यह नासा द्वारा अंतरिक्ष में भेजा गया अब तक का सबसे बड़ा रडार एंटीना रिफ्लेक्टर है।

यह तकनीक हर 12 दिन में दो बार पूरी पृथ्वी की सतह और बर्फ की चादरों का बारीकी से मुआयना करेगी।


By Muhammad Sultan

मैं मुहम्मद सुल्तान हूँ, एक पैशनेट न्यूज़ राइटर। 'Global Update Today' के ज़रिए मेरी कोशिश रहती है कि दुनिया के हर कोने से साइंस, स्पेस और करंट अफेयर्स की वो ख़बरें आप तक लाऊँ, जो आपके लिए जानना ज़रूरी हैं। मेरी लिखी ख़बरों में आपको हमेशा डीप रिसर्च और आसान भाषा मिलेगी।

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