टोक्यो की सड़कों पर रात के अंधेरे में हजारों चमकती लाइटें और हवा में गूंजते नारे। सुगिनामी वार्ड की रहने वाली एक 50 वर्षीय महिला कर्मचारी के हाथ में तख्ती थी — ‘संविधान बचाओ।’ उन्हें डर है कि अगर अनुच्छेद 9 बदला गया, तो उनके परिवार को अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे इस भयानक युद्ध में झोंका जा सकता है। यह उस जापान की जमीनी हकीकत है जो आज एक बड़े ऊर्जा और राजनीतिक संकट के मुहाने पर खड़ा है।
इस बढ़ते डर और मिडिल ईस्ट में मचे बवाल के बीच, जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची ने एक बड़ा फैसला लिया है। सरकार मई की शुरुआत में अपने राष्ट्रीय भंडार से 20 दिन का कच्चा तेल निकालने जा रही है। अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच फरवरी में शुरू हुई जंग के बाद यह दूसरी बार है जब जापान को अपनी इमरजेंसी तिजोरी खोलनी पड़ी है। वहीं दूसरी तरफ, जापान को युद्ध में धकेलने के अमेरिकी दबाव के खिलाफ संसद (डाइट) के बाहर 30,000 से ज्यादा लोग सड़कों पर उतर आए हैं, जो युद्ध के सख्त खिलाफ हैं।
यह संख्या अचानक नहीं बढ़ी। फरवरी के अंत में महज 3,600 लोग सड़कों पर थे। आठ हफ्तों में यह तादाद आठ गुना से ज्यादा हो गई है।
इस पूरे संकट की जड़ें होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के अशांत पानी में फंसी हैं। जापान अपनी जरूरत का 95% से ज्यादा तेल मिडिल ईस्ट से मंगाता है। युद्ध के कारण सप्लाई चेन बुरी तरह चरमरा गई है। हालांकि सरकार ने पिछले महीने भी भारी मात्रा में तेल जारी किया था और गैस की कीमतों को 170 येन प्रति लीटर पर रोकने के लिए सब्सिडी दी थी, लेकिन जमीनी हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं। इसके ऊपर से डोनाल्ड ट्रंप का भारी दबाव है कि जापान अपनी सेना को इस जंग में उतारे, जबकि जापान का शांतिवादी संविधान इसकी सख्त मनाही करता है। सोमवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में ट्रंप ने सीधे जापान का नाम लिया। उन्होंने कहा, “जापान ने हमारी मदद नहीं की — जबकि हमारे 50,000 सैनिक वहाँ उनकी सुरक्षा के लिए तैनात हैं।”
होर्मुज के रास्ते पर निर्भरता कम करने के लिए सरकार ने एक सॉलिड ‘बैकअप प्लान’ जमीन पर उतारना शुरू कर दिया है। प्रधानमंत्री के मुताबिक, मई तक जापान अपने आधे से ज्यादा तेल आयात के लिए नए रास्ते सुरक्षित कर लेगा। इसके लिए सऊदी अरब के यनबू, यूएई के फुजैरा पोर्ट के अलावा अमेरिका, मलेशिया और अफ्रीकी देशों के सप्लायर्स से सीधी बातचीत चल रही है। साथ ही, देश के अंदर मौजूद ईंधन को हेल्थकेयर, खेती और ट्रांसपोर्ट जैसे सबसे जरूरी सेक्टर्स को पहले देने का कड़ा निर्देश जारी कर दिया गया है।
एक तरफ रणनीतिक भंडार पर लगातार बढ़ता बोझ है, दूसरी तरफ दुनिया की सबसे बड़ी फौजी ताकत का सैन्य दबाव। जापान आज अपनी अर्थव्यवस्था और अपने शांतिवादी उसूलों, दोनों को बचाने की दोहरी लड़ाई लड़ रहा है। अगला बड़ा इम्तिहान मई में है — जब नए तेल रूट चालू होंगे और होर्मुज पर अमेरिकी दबाव फिर बढ़ेगा। तब तक संसद के बाहर वो पेनलाइटें जलती रहेंगी।

