चर्नोबिल के 302 कुत्ते: 40 साल के रेडिएशन ने इनके DNA में क्या बदला?

चर्नोबिल एक्सक्लूजन जोन के जंगलों में दौड़ते दुर्लभ प्राजेवाल्स्की जंगली घोड़े। 'नो-मैन्स-लैंड' के रेडियोएक्टिव खंडहरों के बीच, 'ताखी' घोड़ों का यह झुंड विपरीत परिस्थितियों में जीवन की वापसी का एक जीवंत दृश्य पेश करता है। (AP Photo/Evgeniy Maloletka)

26 अप्रैल 1986 को यूक्रेन के चर्नोबिल परमाणु संयंत्र में इतिहास की सबसे बड़ी परमाणु आपदा हुई थी। इसके तुरंत बाद प्रशासन ने पूरे शहर को खाली कराने की अनिवार्य सरकारी निकासी शुरू की। इस वजह से दसियों हजार लोगों को अपना घर हमेशा के लिए छोड़ना पड़ा।

इस भयंकर परमाणु हादसे के शुरुआती विस्फोट में 30 कर्मचारियों की तुरंत मौत हो गई थी। इसके बाद लंबे समय में रेडिएशन के जहर से मरने वालों की अनुमानित संख्या हजारों में आंकी गई। आज चार दशक बाद, इंसानी बस्तियों से खाली पड़े इस इलाके में प्रकृति ने अनोखी वापसी की है।

परमाणु प्लांट के आसपास का यह प्रतिबंधित क्षेत्र लक्ज़मबर्ग देश से भी बड़ा है और अब यहां जंगली जानवरों का कब्जा है। यहां दुनिया के सबसे दुर्लभ प्राजेवाल्स्की घोड़े और लावारिस कुत्तों के झुंड रेडियोएक्टिव खंडहरों के बीच जीवित रह रहे हैं। वैज्ञानिक अब इन जानवरों के डीएनए (DNA) की जांच कर रहे हैं।

इस शोध का मुख्य उद्देश्य यह समझना है कि इतने भारी रेडिएशन के बीच जीवन खुद को कैसे ढालता है। चर्नोबिल का यह पूरा इलाका अब दुनिया के लिए एक विशाल और वास्तविक प्रयोगशाला बन चुका है। ‘साइंस एडवांसेज’ जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, यहां रहने वाले 302 कुत्तों में खास जेनेटिक अंतर मिले हैं।

ये कुत्ते उन पालतू जानवरों के वंशज हैं जिन्हें 1986 की निकासी के दौरान स्थानीय लोग मजबूरी में छोड़ गए थे। वैज्ञानिकों ने डीएनए नमूनों के आधार पर इन कुत्तों के 15 अलग-अलग परिवारों की सफलतापूर्वक पहचान की है। यह खोज इस लिहाज से महत्वपूर्ण है कि यह रेडिएशन के बीच आबादी के टिके रहने के रहस्य खोलती है।

रेडिएशन के बीच कुत्तों के 15 परिवारों का रहस्य

यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ कैरोलिना के प्रोफेसर टिम मूसो 1990 के दशक के अंत से इस इलाके में काम कर रहे हैं। उन्होंने 2017 के आसपास कुत्तों के खून के नमूने इकट्ठा करने शुरू किए। इनमें से कुछ कुत्ते रिएक्टर के बिल्कुल पास रहते हैं, जबकि कुछ 15 किलोमीटर और 45 किलोमीटर दूर बाहरी क्षेत्रों में बसे हैं।

नेशनल ह्यूमन जीनोम रिसर्च इंस्टीट्यूट की जेनेटिसिस्ट एलेन ओस्ट्रेंडर इस अध्ययन की प्रमुख सह-लेखकों में से एक हैं। उनकी टीम ने मूसो द्वारा जमा किए गए इन्हीं नमूनों के डीएनए का गहराई से विश्लेषण किया। ओस्ट्रेंडर के शब्दों में, यह उनके लिए “एक बहुत बड़ी उपलब्धि” थी।

जेनेटिसिस्ट एलेन ओस्ट्रेंडर इस वैज्ञानिक खोज के परिणामों को विस्तार से साझा करती हैं। वह कहती हैं, “अब हम डीएनए की तुलना करके बता सकते हैं कि क्या बदला है, क्या म्यूटेट हुआ है, क्या विकसित हुआ है। हम जान सकते हैं कि डीएनए लेवल पर कौन सी चीज आपको फायदा पहुंचाती है और कौन सी नुकसान।”

पर्ड्यू यूनिवर्सिटी की पशु चिकित्सक डॉ. कारी एकेंस्टेड का मानना है कि यह शोध बड़े स्तनधारियों पर रेडिएशन के प्रभाव को समझने की दिशा में पहला कदम है। 15 पीढ़ियों से रेडिएशन के बीच जी रहे ये कुत्ते वैज्ञानिकों को जेनेटिक अनुकूलन की नई थ्योरी दे रहे हैं।

प्रोफेसर टिम मूसो की टीम ने अपने लंबे शोध में पाया कि ये कुत्ते जंगली होने के बावजूद इंसानी संपर्क काफी पसंद करते हैं। खासकर जब खाना सामने हो, तो वे अपनी पूंछ हिलाकर वैज्ञानिकों का स्वागत करते हैं। मूसो की टीम ने अपने करीब आए एक कुत्ते का नाम ‘प्रांसर’ (Prancer) भी रखा है।

जंगली घोड़ों की वापसी और सरोगेसी का प्रयोग

कुत्तों के अलावा, चर्नोबिल के इस परिदृश्य में प्राजेवाल्स्की घोड़े भी शोध का मुख्य केंद्र हैं। मंगोलिया के मूल निवासी इन घोड़ों को 1998 में यहां एक प्रयोग के तौर पर छोड़ा गया था। आज यूक्रेन के पास स्वतंत्र रूप से घूमने वाले इन दुर्लभ घोड़ों की एक स्थिर आबादी है।

प्राजेवाल्स्की घोड़ों की बनावट आम घरेलू घोड़ों से अलग होती है। मंगोलिया में इन्हें ‘ताखी’ यानी आत्मा कहा जाता है। इनमें क्रोमोसोम के 33 जोड़े होते हैं, जबकि पालतू घोड़ों में केवल 32 जोड़े पाए जाते हैं।

ये छोटे और मजबूत घोड़े अब चर्नोबिल के जंगलों और खाली सोवियत इमारतों को अपना नया घर बना चुके हैं। चर्नोबिल के प्रमुख प्रकृति वैज्ञानिक डेनिस विस्नेव्स्की इन घोड़ों के व्यवहार पर करीब से नजर रखते हैं।

उनका कहना है कि ये जानवर अब खंडहरों के भीतर रहने लगे हैं। वे पुरानी इमारतों का उपयोग खराब मौसम और कीड़ों से बचने के लिए शेल्टर के रूप में करते हैं। ये एक नर और कई मादाओं के छोटे सामाजिक समूहों में रहते हैं।

दुनिया भर में इन घोड़ों की संख्या 2,000 से भी कम बची है, इसलिए इनका संरक्षण बहुत जरूरी है। मिनेसोटा चिड़ियाघर में हाल ही में ‘मरात’ नाम के एक बीमार घोड़े के बच्चे ने सुर्खियां बटोरीं। मरात को उसकी मां ने त्याग दिया था और वह निमोनिया व सेप्सिस से जूझ रहा था।

मरात को बचाने के लिए वैज्ञानिकों ने एक असामान्य कदम उठाया। ‘एलिस’ नाम की एक घरेलू पोनी घोड़ी ने मरात को अपने बच्चे की तरह अपना लिया। पशु चिकित्सकों के अनुसार, एशियाई जंगली घोड़ों में इस तरह की सरोगेसी के पहले कुछ प्रयासों में यह एक है।

मिनेसोटा चिड़ियाघर के डॉ. एनी रिवास का कहना है कि एलिस ने मरात को तुरंत स्वीकार कर लिया और उसे दूध पिलाना शुरू किया। यह एक सफल प्रयोग साबित हुआ जिसने एक दुर्लभ घोड़े की जान बचा ली। मरात अब धीरे-धीरे अपनी जंगली आदतों को सीख रहा है।

संरक्षण की चुनौतियां और गिरे हुए ड्रोन का खतरा

चर्नोबिल में इन जानवरों के सामने अब युद्ध की नई चुनौतियां भी खड़ी हो गई हैं। 2022 में रूस के आक्रमण के बाद से यह पूरा जोन एक भारी सुरक्षा वाले सैन्य कॉरिडोर में बदल गया है। सैनिकों द्वारा रेडियोएक्टिव मिट्टी में खोदी गई खाइयों ने स्थानीय जोखिम को काफी बढ़ा दिया है।

युद्ध के दौरान सर्दियों के कठोर मौसम ने भी भारी तबाही मचाई है। पावर ग्रिड को नुकसान पहुंचने से आसपास के क्षेत्रों में संसाधनों की कमी हो गई है। वैज्ञानिक रिपोर्ट कर रहे हैं कि गिरे हुए पेड़ों और मृत जानवरों की संख्या में अचानक वृद्धि हुई है।

सर्दियों के कठोर मौसम और गिरे हुए ड्रोन (Downed drones) के कारण चर्नोबिल के जंगलों में अक्सर आग लग जाती है। आग बुझाने वाली टीम के प्रमुख ऑलेक्ज़ेंडर पोलिशचुक कहते हैं कि गिरे हुए ड्रोन से जंगलों में लगने वाली आग रेडियोएक्टिव कणों को दोबारा हवा में फैला देती है।

रेडिएशन का असर आज भी चर्नोबिल के वन्यजीवों पर सूक्ष्म रूप से देखा जा सकता है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि ज्यादा रेडिएशन वाले इलाकों में पक्षियों को मोतियाबिंद होने का खतरा अधिक होता है। वहीं, कुछ स्थानीय मेंढकों की त्वचा का रंग सामान्य से अधिक गहरा हो गया है।

प्रकृति का ‘फैक्टरी रीसेट’ और भविष्य

आज यह क्षेत्र कंक्रीट बैरियर, कांटेदार तार और माइनफील्ड्स से घिरा हुआ है। रेडिएशन के खतरे को कम करने के लिए यहां तैनात कर्मचारियों को छोटी-छोटी शिफ्ट में काम करना पड़ता है। इन खतरों के बावजूद, प्रकृति वैज्ञानिक डेनिस विस्नेव्स्की इस बदलाव को सकारात्मक रूप से देखते हैं।

उनका मानना है कि इंसानी दखल खत्म होने से प्रकृति ने यहां खुद को रीसेट कर लिया है। अब यहां पेड़ इमारतों को चीरकर बाहर निकल रहे हैं और सड़कें जंगल में बदल रही हैं। पुराने सोवियत साइनबोर्ड अब जंगलों के बीच खड़े हैं।

विस्नेव्स्की कहते हैं, “यह जमीन कभी खेती और बुनियादी ढांचे के लिए इस्तेमाल होती थी, लेकिन अब प्रकृति ने यहां प्रभावी ढंग से ‘फैक्टरी रीसेट’ कर दिया है।”

उनका मानना है कि चर्नोबिल जोन आने वाली कई पीढ़ियों तक इंसानों के लिए बंद रहेगा। लेकिन यहां मौजूद 302 कुत्ते, दुर्लभ घोड़े और बदलते मेंढक वैज्ञानिकों को यह समझने का हर मौका दे रहे हैं कि जीवन विपरीत परिस्थितियों में खुद को कैसे बदलता है।

By Muhammad Sultan

मैं मुहम्मद सुल्तान हूँ, एक पैशनेट न्यूज़ राइटर। 'Global Update Today' के ज़रिए मेरी कोशिश रहती है कि दुनिया के हर कोने से साइंस, स्पेस और करंट अफेयर्स की वो ख़बरें आप तक लाऊँ, जो आपके लिए जानना ज़रूरी हैं। मेरी लिखी ख़बरों में आपको हमेशा डीप रिसर्च और आसान भाषा मिलेगी।

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